पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं
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बचपन और हमारा पर्यावरण--अविनाश वाचस्‍पति

>> शुक्रवार, 20 मई 2011

अविनाश वाचस्‍पति : परिचय
14 दिसम्बर 1958 में जन्म। भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचा परिचय', तथा हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम  दैनिक समाचार-पत्रपत्रिकाओंअंतर्जाल पत्रिकाओं इत्यादिमें रचनाएं प्रकाशित। अनेक काव् संग्रहों में कविताएं शामिल। वर्ष 2008 और वर्ष 2009 में यमुनानगरहरियाणा में आयोजित हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में फिल्मोत्सव   समाचार के तकनीकी संपादक।
शहर में हैं सभी अंधे (1994), ेताला काव् संग्रह (1984) में  संपादन/प्रकाशन। नवें दशक के प्रगतिशील कवि कविता संग्रह के प्रमुख हस्ताक्षर। हाल ही में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति पुस्‍तक का सह-संपादन।
'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' ,हास्य व्यंग्य श्रेणी में संवा सम्मानलोकसंघर्ष परिकल्पना सम्मान 2010 में वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार  विता पुस्तक शहर में हैं सभी अंधे पर साहित् शिल्पी सम्मान सूचना और प्रसारण मंत्रालय से वर्ष 2008-2009 के लिए हिंदी साहित्य सम्मान
हिंदी ब्लॉग नुक्कड़ , पिताजीबगीचीअविनाश वाचस्पतिकाझक टाइम्  इत्यादि   मिलाकर 30 से अधिक हिन्दी ब्लॉगों  सक्रिय। सोपानस्टेप मासिक,  डीएलए में साप्ताहिक व्यंग्य लेखन लेखन।
संपर्क--साहित्यकार सदनपहली मंजिल, 195 सन् नगरनई दिल्ली 110065 मोबाइल 09868166586/09717849729  मेल पता nukkadh@gmail.comtetaalaaa@gmail.com
संप्रति -- फिल् समारोह निदेशालयसूचना और प्रसारण मंत्रालय दिल्ली में कार्यरत्।

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लेख का विषय बहुत माकूल है और प्रासंगिक भी।  पर्यावरण को सुधारने और बिगाड़ने संबंधी मानवीय चिंतायें बेहद चिंतनीय हैं। व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाये तो बचपन के पर्यावरण को सबसे स्‍वच्‍छ पाया गया है। आपने वह फिल्‍मी गीत सुना ही नहीं होगा बल्कि जहन में अब भी गूंज रहा होगा। नन्‍हा मुन्‍ना राही हूंदेश का सिपाही हूंमेरे साथ मिलकर बोलोजयहिन्‍दजयहिन्‍दजयहिन्‍द

बचपन के पर्यावरण की यह निश्‍छलता  देश काल की सीमाओं से बाहर अपने अक्षितिजीय मनभावन स्‍वरूप में संपूर्ण सृष्टि में नेह बरसा रही है। बचपन में हम पैंया पैंया चलते रहे हैं और उससे भी पहले घुटनों के बल खिसकते रहे हैं। बिना कहेबिना सुने अपने विचारों के जरिए अनुभवों की सैर का आनंद लेते रहे हैं। खिसकने से पैदल चलने का यह सफरपैदल के बाद साईकिल की सवारीसाईकिल के बाद किशोर होने पर मोटर साईकिल और स्‍कूटर पर उतर चढ़तफिर कारबससारे चौपहिये वाहनऔर फिर इससे आगे बढ़कर रेल, जिसके पहिये गिने तो जा सकते हैं, पर कोई गिनता नहीं हैसिवाय उनके जिन्‍हें उनका गिन गिनकर  हिसाब रखना होता है।

गिनता है बचपन में बच्‍चासिर्फ रेल के पहिये ही नहींकितनी चींटियां जमीन पर चल रही हैंकितने मच्‍छर उड़ रहे हैंकितने कुत्‍ते भौंक रहे हैंकितनी मक्खियां हैंउन्‍हें मारने की कोशिश करता बचपनबचपन में क्रूरता का समावेश करता चलता है। वो गिनता तो है उन रोटियों को भी जिनसे वो अपने पेट की भूख मिटाता हैभाई बहनों को भी जिनके साथ रहता हैदोस्‍तों पड़ोसियों कोइन पर प्‍यार लुटाता हैमाता पिता कोहितैषियों को जिनसे असीम प्‍यार दुलार पाता है। देखता है उस इंसान के बारे में जो मुंह से धुंआ उगलता दिखलाई देता है। धुंआ सिर्फ धूम्रपान का ही नहीं, अपशब्‍दों की बारिश भी, जिनसे रोजाना रूबरू होता है। वहीं से सही-गलत सब सीखता बढ़ता रहता है। जबकि वो घट रहा होता है। दिन, शरीर के स्‍तर पर और वैचारिक स्‍तर पर बढ़ रहा होता है। अनुभवों के मायने में समृद्धत्‍व को प्राप्‍त हो रहा होता है। पर इस गिनती में कोई स्‍वार्थ नहीं होता। स्‍वार्थ से बचा रहे ऐसा नहीं होता।

यह अच्‍छा है तो मेरा हैमेरे भाई का हैमेरी बहन का हैमेरे मित्र का हैमेरे पिता का हैमाता का है और जो बुरा है वो तेरा हैकिसी अनजाने का है। जबकि अनजाना कौन हैसबमें मानवमन समाया है। बचपन में मच्‍छरों, चींटियों, मक्खियों को मारने से उपजी क्रूरता बचपन को मार देती है। थोड़ा और बढ़े होने पर सांप, बिच्‍छू को मारना। जबकि वही जब किसी कुत्‍ते के पिल्‍ले कोबिल्‍ली को, गिलहरी को दुलार करती है तो बचपन का आनंद कई सौ गुना बढ़ जाता है। नके अच्‍छ प्रभाव से हम इंसानियत के पर्यावरण को सब सुधरता हुआ देखते हैं।

जमीन पर दौड़ने में फास्‍ट मेट्रो उसके बाद हवाई जहाज की रनवै पर तेज दौड़भला उससे कौन करेगा होड़  पर उससे भी होड़ जारी है  सबसे तेज विचारों की सवारी है। इन विचारों का पर्यावरण स्‍वच्‍छ है, तो प्रत्‍येक मन गंगा हैमन कठौती है और विचार गंगा है। किसी का मन नहीं बुराईयों से रंगा है। बचपन स्‍नेह का अपनाबन। बननाबनना और मन का  सबसे बंधते जाना। 

अब इस पर्यावरण पर भी खूब खतरा तारी हो रहा है। बचपन वो बचपन नहीं रहाजो देश कोसंसार को अपने बचपने से लुभाये। अब बचपना आधुनिकता के मकड़जाल में उलझ गया है और इस बुरी तरह से उलझ गया है कि सुलझाये नहीं सुलझ रहा है। फास्‍टता इतनी अधिक और इतनी तेजी से समाती जा रही है बल्कि बरगलाती जा रही है कि फूड बन रहा है फास्‍टफूडभाषा बन रही है फास्‍टभाषा (एस एम एस और चैनलों की भाषा पर गौर कीजिए और यही बन रही है अखबारों में खबरों की भाषा)फास्‍टमेट्रोफास्‍टजहाज (चाहे युद्धक सहीपर युद्ध बुराईयों से तो है सही परंतु युद्ध नहीं सहीजो बचपन के विरुद्ध लड़ा जा रहा है) फास्‍टमोबाइलजो सभ्‍यता और संस्‍कृति को बच्‍चों से दूर ले जा रहा है इन्‍हें भटका रहा है और ये बचपन मटक रहा है अच्‍छाईयों को गटक रहा है। इसमें न अटकेंइससे बचें और बाहर निकलेंतभी बचपन का पर्यावरण सुरक्षित रहेगाचाहते सब हैं परंतु बचपन में इस भंवर में फंसने के बादबड़े होने पर समझते हैंअहसासते हैं पर समय से क्‍या करेंआप ही ढूंढ़ कर बतलायें कोई कारगर उपाय।

पर एक फास्‍टता सबको लुभा रही है और उसके जरिए हमारी सबकी प्‍यारी हिन्‍दी समूचे संसार में अपना सिक्‍का जमा रही है। सिक्‍का जो सोने का नहीं हैडायमंड का नहीं है और न ही है चांदी का। वह सिक्‍का है इंटरनेट पर हमारी हिन्‍दी की भूमंडलीय सार्थक उपस्थिति। हिन्‍दी जिसने हिन्‍दी फिल्‍मी गीतों के जरिए पूरे विश्‍व में हिन्‍दी के पर्यावरण को महकायाउसे और फास्‍टता के साथ इंटरनेटीय तीव्रता से सुगंधित कर रही है। पूरे विश्‍व को हिन्‍दीहोम बना रही है। आप जान लीजिए कि पूरे समूचे विश्‍व को हिन्‍दीहोम सिर्फ हिन्‍दी के द्वारा ही बनाया जा सकता हैहिन्‍दी प्रेमी ही बना सकता है और समूचा जगत हिन्‍दी प्रेमी बनता जा रहा है।

पर्यावरण पर चढ़े हुये छद्म आवरण को वरण मत कीजिए। बचपन से ही तज दिया जायेऐसा कारगर उपाय कीजिए। बचपन पर बच्‍चों का ही नहींसबका मन अहसास करे सुंदर सलोने बचपनीय मन का। शरीर की प्रत्‍येक रक्‍तवाहिनी मेंनस नाड़ी मेंविचारों की गाड़ी में बचपन ही सवार नजर आए। हर नजर खिलखिलाए। पर्यावरण प्रत्‍येक मन का अंदर तक सुंदर बना रहे। यही कामना है जीवन की। पुरस्‍कार चाहे न मिलेनकद राशि बिल्‍कुल भी न मिलेपर बचपन और पर्यावरण का तारतम्‍य अपनी स्निगधता में बना रहेयही मेरी और प्रत्‍येक नेक सच्‍चे मानव मन की कामना है। 

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बचपन और हमारा पर्यावरण---डा श्याम गुप्त

>> शनिवार, 9 अप्रैल 2011

                                                           -- परिचय--
नाम-- ---डा श्याम गुप्त       जन्म---१० नवम्बर, १९४४ ई.  
पिता—स्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, .
    जन्म स्थान—मिढाकुर, जि. आगरा, उ.प्र. .भारत   शिक्षा—एम.बी.,बी.एस., एम.एस.(शल्य)
    व्यवसाय-चिकित्सक,(शल्य)-उ.रे.चिकित्सालय ,लखनऊ से व.चि. अधीक्षक पद से सेवा निवृत
 साहित्यिक गतिविधियां-विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध, काव्य की सभी विधाओं—गीत, अगीत, गद्य निबंध, कथा, आलेख , समीक्षा आदि में लेखन। इन्टर्नेट पत्रिकाओं में लेख।  
     प्रकाशित कृतियाँ  -- १. काव्य दूत, २. काव्य निर्झरिणी ३. काव्य मुक्तामृत (काव्य सन्ग्रह) ,
      ४. सृष्टि –अगीत विधा महाकाव्य  ५.प्रेम काव्य-गीति विधा महाकाव्य ६. शूर्पणखा महाकाव्य ।
मेरे ब्लोग्स( इन्टर्नेट-चिट्ठे)—http://shyamthot.blogspot.com ,  sahityshyam , vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com   
सम्मान आदि—नराकास , राजभाषा विभाग,(उ प्र) द्वारा राज भाषा सम्मान, २००४, २००५.;
  अभियान जबलपुर संस्था द्वारा हिन्दी भूषण सम्मान, विन्ध्य.हिन्दी विकास संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बावा दीप सिन्घ स्म्रति सम्मान, अ.भा.अगीत परिषद द्वारा-श्री कमलापति मिस्र सम्मान, अ.भा. साहित्यकार दिवस पर प.सोहन लाल द्विवेदी सम्मान, अगीत विधा महाकाव्य सम्मान, जाग्रति प्रकाशन मुम्बई द्वारा-पूर्व पश्चिम गौरव सम्मान, इन्द्रधनुष सन्स्था बिज़नौर द्वारा-काव्य मर्मग्य सम्मान, छ्त्तीस गढ शिक्षक संघ द्वारा-हिरदे कविरत्न सम्मान, युवाओं की सन्स्था; ’सृजनद्वारा महाकवि सम्मान ।
 पता—  डा श्याम गुप्त,  सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना ,लखनऊ-( उ.प्र. भारत ) २२६०१२ .
          मो. ०९४१५१५६४६४ -----------------------------------------------------------------------------------
बचपन और हमारा पर्यावरण
        बचपन और पर्यावरण में क्या संबंध है ? सम्बन्ध है, गहन सम्बन्ध है, अन्तः सम्बन्ध है। बचपन मानव जाति, मानवता अपितु समस्त प्राणि-जगत का भविष्य है और सुन्दर, स्वस्थ्य,व अनुकूल पर्यावरण उस भविष्य, भावी पीढी को विकसित, पल्लवित, पुष्पित व फ़लित होने देने के लिये आवश्यक वातावरण, पृष्ठ भूमि व भाव-भूमि है।
        अतः पर्यावरण का प्रदूषण समस्त प्राणिजगत के वर्तमान, भविष्य व अस्तित्व के लिये महान संकट का कारक है। पर्यावरण प्रदूषण केवल जल, थल, वायु प्रदूषण द्वारा प्राणी जीवन के शारीरिक दौर्वल्य व क्षमता में कमी ही नहीं करता अपितु वह मानसिक, चारित्रिक व सामाजिक प्रदूषण का भी कारण बनकर-भ्रष्टाचार,चरित्र-हीनता, आचरणगत दौर्वल्य व वन्शानुगत दुर्बलता का भी कारक बनता है। पर्यावरण मानव ही प्रदूषित करता है और मानव पर ही उसके दुष्प्रभाव होते हैं जो मूलतः आगे आने वाली पीढी भुगतती है। अतः यदि मानवता के भविष्य—संतति को बचपन से ही स्वस्थ्य व सुन्दर, अनुकूल पर्यावरण प्राप्त नहीं होगा तो मानवता व समस्त प्राणि जगत का ही भविष्य अन्धकारमय रहेगा।
       सामाजिक प्राणी होने के कारण जहां भी जब भी मानव, सामाजिकता व प्राकृति अनुशासनों के विरुद्ध कार्य व आचरण करता है तो पर्यावरण सहित प्रत्येक प्रकार के वातावरण को दूषित करता है। अतः जहां हमें स्वयं अपने आचरणों से पर्यावरण पर ध्यान देना होगा वहीं बचपन से ही भावी पीढी व बच्चे यदि अनुशासित नहीं होंगे तो वे पुनः पुनः समाज व पर्यावरण को प्रदूषित करते रहेंगे। अतः बचपन से ही पर्यावरण संबर्धन, समाज, भौतिकता, साहित्यिकता, नैतिकता, संस्कृति-रक्षण के संस्कार बच्चों में डालने चाहिये, ताकि वे अच्छे नागरिक बनकर पर्यावरण को संतुलित रखें।
       आज केवल वातावरणीय पर्यावरण-जल, थल, वायु-ही प्रदूषित नहीं है अपितु मानसिक, सामाजिक, प्रदूषण से भी धरती ग्रसित है। अतितीब्र गति से अनियमित विकास, संसाधनों का अति-दोहन-वृक्षों ,जन्गलों की अन्धाधुन्ध कटाई, अति-भौतिकतायुक्त सुख-सुविधायुक्त जीवनचर्या के कारण हम पृथ्वी के वातावरण को प्रदूषित करते जारहे हैं। ग्लोबल वार्मिन्ग, ग्लेशियरों का कम होना आदि इसी के परिणाम हैं।
      आज बच्चों के खेलने के लिये उपयुक्त पार्कों ,मैदानों को बहुमन्जिली इमारतों में बदला जारहा है, जहां दिखाने भर को कुछ थोडा सा स्थान बच्चों के पार्क
आदि के नाम पर रखदिया जाता है। घर घर में खुलते हुए स्कूल-कालेज-संस्थानों में खेलने-कूदने, स्वास्थ्य प्रदायक स्थान होते ही कब हैं। सडकों पर बच्चों को मास्क
२.
लगाकर जाते हुए देखा जा सकता है, विभिन्न श्वांस के रोग व अन्य रोगों दमा, सांस फ़ूलना, एलर्जी, जैसी बीमारियों का बच्चों में बढना प्रदूषण के कारण ही है। स्कूल कालेजों के बच्चों का अपराधों में लिप्त होना, गोली चलाना, लूट-अपहरण आदि में शामिल होना आदि सर्वांगीण प्रदूषण का ही परिणाम है। तेज आवाज के शोर-गानों आदि द्वारा ध्वनि प्रदूषण से बच्चों की श्रवण क्षमता घट रही है। प्रदूषित व मिलावटी खाद्य सामग्री से बच्चों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर प्रभाव पड रहा है।
       बचपन और पर्यावरण के अन्तःसम्बन्ध का ज्ञान भारतीय मनीषा व पुरा वैदिक विज्ञान को युगों पहले ही था। अथर्ववेद- ४/७ में ऋषि  कहता है—
     “ यदस्या कश्मैचिद् भोगाय् बलात् कश्मिद्द प्रक्रतान्ते ।
       ततं क्रिस्तेण् म्रियन्ते वत्सोश्च् धानुकोः ब्रकः      ॥
अर्थात् जो (व्यक्ति,समाज़्,शासन्) केवल भोग्-विलास् व लिप्सावश् प्रकृति का कर्तन्, दोहन् करते हैं, उनकी सन्तानें, पशु-पक्षी मृत्यु को प्राप्त् होते हैं। व्यक्ति समाज़् व राष्ट्र का नैतिक् कर्तव्य् निर्धारित् करते हुए अथर्व् वेद् कहता है—
   “  यदस्य् गोपदो सत्यालोप् अज़ोहितः ।
     तत्कुमारा म्रियन्ते ,यक्ष्मो विन्दत् नाशयात् ॥ “
अर्थात् जिस् ग्रह् ,नगर्, ग्राम्,समाज्, राष्ट्र में पर्यावरण् नष्ट् होता है वहां सन्तति ( ज़ैविक् धन्-पशु,पक्षी, मानव्-सन्तान् ) को यक्ष्मा (विभिन्न रोग् व विकार ) जकड कर् हानि पहुंचाते हैं। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद -४/१८ में  कहा है-
    “अयं पन्था अनुबित्तः पुराणो मतां देवां उपजायंत् विश्वे ।
    अतश्चिदा जनयीष्ट् प्रबुद्दो मा मातरममुया पन्तवेः कः  ॥ “
अर्थात् यह् पन्थ् सनातन् है ( सदैव सुनिश्चित् तथ्य ) कि प्रबुद्द लोग् अपनी आधार भूता माता (प्रकृति  व पर्यावरण्) को विनष्ट् न करें, यह् उनका प्रथम् कर्तव्य् है।
       इस प्रकार कहा जासकता है कि निश्चय ही पर्यावरण का बचपन से सीधा सम्बन्ध है, और यदि बचपन को स्वस्थ्य, सुखद, अनुकूल, अप्रदूषित पर्यावरण नहीं मिलता तो प्राणी जगत का भविष्य अन्धकारमय होना निश्चित है। हमें मनसा, वाचा, कर्मणा पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सजग होजाना चाहिये, बच्चों को भी यह ज्ञान प्राप्त कराना चाहिये, ताकि संस्कृति, परम्परा ,प्रगति, विकास व आधुनिकता के समन्वित भाव से हर प्रकार का प्रदूषण समाप्त हो; और इन सबके समायोजन व समन्वय को लेकर चलने वाला भारतीय विश्वबंधुत्व-भाव, साहित्य, शास्त्र-परम्परा व वैदिक-विज्ञान के मार्ग पर चलकर ही बचपन व संपूर्ण मानवता के कल्याण का यह मार्ग प्रशस्त होगा, जो आज के भौतिकवादी युग की अनन्यतम आवश्यकता है ।

     रचनाकार ----डा श्याम गुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ(उप्र)-२२६०१२ --मो. ०९४१५१५६४६४.

           

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बचपन और हमारा पर्यावरण -- जयदीप शेखर

>> गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

लेखक परिचय
नाम- जयदीप दास. कलमी नाम- जयदीप शेखर.
       भूतपूर्व वायुसैनिक, वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में सहायक.
मेरे ब्लॉग- नाज़-ए-हिन्द सुभाष, कभी-कभार, विन्दुधाम बरहरवा, खुशहाल भारत, कारवाँ और आमि यायावर.  
       पिता का नाम- डॉ. जे.सी. दास
       स्थायी निवास- विन्दुधाम पथ, बरहरवा- 816101, जिला- साहेबगंज, झारखण्ड.  
वर्तमान पता- भा.स्टेट बैंक, कृषि बाजार प्राँगण शाखा (6427), अररिया कोर्ट- 854311 (बिहार)
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बचपन और हमारा पर्यावरण

विषय प्रवेश
थोड़ी देर के लिए हम अपने-आप को ब्रह्माण्ड के बाहर रखकर देखते हैं। क्या पाते हैं- अरबों-खरबों प्रकाश वर्ष दूर तक विभिन्न आकार-प्रकार के आकाशीय पिण्ड फैले हुए हैं और विभिन्न कांतियों में चमक रहे हैं। मगर इनमें से किसी पर भी 'जीवन' नहीं है। 'जीवन' की लौ अगर कहीं है, तो वह है- ब्रह्माण्ड के एक कोने में स्थित नीहारिका 'आकाशगंगा' के एक छोटे-से सौर-मण्डल के एक नन्हे-से नीले रंग के ग्रह पर, जिसका नाम है- पृथ्वी! ओह, इतना विशाल ब्रह्माण्ड और मात्र एक छोटे-से ग्रह पर जीवन! अगर यहाँ भी 'जीवन' नष्ट हो गया तो? सोचकर ही सिहरन पैदा होती है। अर्थात् यहाँ 'जीवन' को बचाये रखना जरूरी है। इसके लिए क्या करना होगा? पृथ्वी के 'पर्यावरण' को कायम रखना होगा, क्योंकि इसके खास 'पर्यावरण' के कारण ही यहाँ जीवन कायम है। इस पर्यावरण को कौन बचायेगा? बेशक, इस ग्रह पर रहने वाला प्रकृति का सबसे बुद्धिमान जीव- मनुष्य!
क्या वाकई 'जीवन' को खतरा है?
जी हाँ, वाकई पृथ्वी पर 'जीवन' को खतरा है। हमारी आने वाली नस्लों के बच्चों के लिए साँस लेना भी दूभर होने वाला है। पृथ्वी की हवा, इसकी मिट्टी, इसका पानी, यहाँ तक कि इसका 'अन्तरिक्ष' भी प्रदूषित हो चुका है। 'ओजोन' रक्षा-कवच में छेद हो रहे हैं। ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघल रही है। या तो सूर्य की पराबैंगनी किरणें सबकुछ जलाकर खाक कर देंगी, या फिर, सबकुछ जलमग्न हो जायेगा। 
क्या है कारण
धरती पर बढ़ती जनसंख्या तथा 'उपभोगवादी' जीवन शैली इसके कारण हैं। इन दोनों बातों के चलते जंगल उजाड़े जा रहे हैं; खेतों में, हवा में और नदियों में जहर घोले जा रहे हैं, और 'ई-कचरों' तथा परमाण्विक कचरों का जखीरा बढ़ाया जा रहा है। हमारी स्थिति उन चिड़ियों-जैसी हो गयी है, जो रटती थीं- 'शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फँसना मत'- और जाल में फँसती जाती थीं। यानि, हम और हमारी सरकारें अच्छी तरह जानती हैं कि पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाकर हम न केवल आनेवाली पीढ़ियों का जीना मुश्किल कर रहे हैं, बल्कि धरती पर 'जीवन' को ही खतरा पहुँचा रहे हैं; फिर भी हम पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाने के नये-नये तरीके ईजाद करते जा रहे हैं। 
क्या हैं उपाय
आँकड़ों और तकनीकी जानकारियों की गहराई में न जाकर हम सीधे इस पर विचार करते हैं कि वे कौन-से उपाय हैं, जिनपर अमल करके हम अपने पर्यावरण को 'प्राकृतिक' बना सकते हैं। वे उपाय हो सकते हैं-
1.       जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण। जिन भौगोलिक क्षेत्रों तथा सामाजिक तबकों में जनसंख्या वृद्धि की दर ज्यादा है, उनकी युवा महिलाओं के लिए खास नौकरियाँ तैयार की जायं और उन्हें इनमें इस शर्त के साथ शामिल किया जाय कि वे अट्ठाईस वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनेंगी। इसी प्रकार, अट्ठाईस वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनने वाली सभी महिलाओं को नकद पुरस्कार भी दिया जाय।
2.       उपभोगवादी संस्कृति पर रोक। जीवन-शैली को शान्त-चित्त तथा 'उपयोग'-वादी बनाया जाय। छह घण्टों से अधिक किसी को भी काम करने की अनुमति न हो। समय कम जान पड़े, तो दो या तीन शिफ्टों में काम किया जाय। इसके लिए वेतन-भत्तों में कमी लाते हुए ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को रोजगार दिया जाय। दूसरी तरफ, लोगों को सामाजिक-सांस्कृतिक-साहसिक कार्यों/अभियानों में भाग लेने के प्रेरित किया जाय। इसके लिए 'बुद्धू बक्से' का प्रसारण दिन में सिर्फ पाँच घण्टों के लिए सीमित करना पड़े, तो वह भी किया जाय।
3.       'मकड़जाल साइकिल ट्रैकों' का निर्माण। जो शहर प्रदूषित घोषित किये जा चुके हैं, वहाँ मोटर गाड़ियों का पंजीकरण एवं स्थानान्तरण बन्द कर दिया जाय और इसके बदले में 'फ्लाय ओवर' साइकिल ट्रैकों का निर्माण किया जाय। इन साइकिल ट्रैकों की संरचना मकड़ी के जाले पर आधारित होगी और यहाँ सभी प्रकार की साइकिलें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहेंगी। इस ट्रैक के उपयोग के लिए मामूली दर पर टिकट लगायी जाय और एक टिकट दिन भर के लिए वैध हो।
4.       जैविक खाद तथा कीट नियंत्रण प्रणाली। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उत्पादन एवं उपयोग तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाय और इसके स्थान पर जैविक खादों तथा 'कीट नियंत्रण प्रणालियों' का तेजी से विकास किया जाय।
5.       बेकार/बंजर जमीन में खेती। खेती का रकबा बढ़ाने के लिए जंगलों को काटने की जरूरत नहीं है। सरकारी विभागों के पास हजारों एकड़ जमीन बेकार पड़ी रहती है। इन जमीनों पर- यहाँ तक कि हवाई अड्डों की खाली जमीन पर भी- जरूरी एहतियात के साथ खेती या बागवानी करवायी जा सकती है। जब हम कहते हैं कि विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है, तो क्या बंजर जमीनों को भी खेती योग्य नहीं बनाया जा सकता?
6.       हरित पट्टियाँ। हर गाँव, कस्बे, नगर, महानगर के चारों तरफ विभिन्न चौड़ाईयों वाली हरित पट्टियों का निर्माण किया जाय। इनमें स्थानीय किस्म के फल-फूल-छायादार पेड़ लगाये जायं।
7.       'जंगल कॉरिडोर'। बड़े जंगलों को 'जंगल कॉरिडोरों' से आपस में जोड़ दिया जाय। इन कॉरिडोरों से होकर गुजरने वाली सड़कों को 'फ्लाय ओवर' तथा रेल ट्रैक को भूमिगत रुप दिया जाय।
8.       छोटे बिजलीघर। एक गहरा कुआँ (जो नहर द्वारा निकटतम नदी से भी जुड़ा हो), एक ऊँचा जलमिनार, एक कृत्रिम 'जलप्रपात', एक टर्बाईन तथा एक पावर हाऊस के सहारे एक, आधा या चौथाई मेगावाट पनबिजली पैदा करना कोई बड़ी बात नहीं है। यहाँ तक कि दो 'स्प्रिंगों' की मदद से एक भारी एवं विशाल पेण्डुलम को 'सदा गतिशील' बनाकर भी उसकी 'गतिज' ऊर्जा को  'विद्युत' ऊर्जा में बदला जा सकता है; या फिर, सीधे उस 'गतिज' ऊर्जा से मिलों/फैक्ट्रियों की गरारियों को घुमाया जा सकता है। इस प्रकार के छोटे-छोटे बिजलीघरों का जाल बिछा दिया जाय। इसके बदले ताप और परमाणु बिजलीघरों को बन्द कर दिया जाय।
9.       सौर ऊर्जा। एक तरफ तो सौर ऊर्जा को सस्ता बनाने की कोशिश की जाय, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग इसका उपयोग कर सके; दूसरी तरफ, सार्वजनिक स्थलों- जैसे, गली व राजपथ, रेल स्टेशन, बस अड्डा, हवाई अड्डा, इत्यादि- पर कम-से-कम दो तिहाई बल्ब और पंखे सौर ऊर्जा से चालित रखे जायं। अन्यान्य इमारतों/भवनों में भी इस अनुपात को अपनाया जा सकता है।
10.   प्रदूषित नदियों का बचाव। जो नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, उनके किनारे-किनारे दो भूमिगत पाईप लाईन बिछाये जायं- एक से होकर कल-कारखानों का कचरा बहेगा तथा दूसरे से नगरों का मल-जल। इस कचरे तथा मल-जल को समुद्र के किनारे स्थापित बड़े परिशोधन संयंत्रों तक लाया जाय और संशोधन के बाद जल को समुद्र में बहा दिया जाय। पाईप लाईन के बीच-बीच में जरूरत के मुताबिक 'पम्पिंग स्टेशनों' की भी व्यवस्था की जाय।
11.   नदियों का स्वाभाविक बहाव। नदियों पर बने बाँधों को तोड़ दिया जाय (पायों पर बने 'पुल' कायम रहें); 'गाद' की सफाई कर नदियों की गहराई बढ़ा दी जाय, और इस प्रकार नदियों को उनके स्वाभाविक रुप में बहने दिया जाय। अन्तर्देशीय 'नौ-परिवहन' को- खासकर माल-ढुलाई के लिए- बढ़ावा दिया जाय। 
12.   ए.सी. का विकल्प। सभी जानते हैं कि 'ओजोन परत' को नुक्सान पहुँचाने में जिन क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन गैसों का बड़ा हाथ है, वे एयर-कण्डीशनर से पैदा होती हैं। नगरों-महानगरों में गर्मी बढ़ाने में भी इन्हीं का हाथ होता है। अतः इन्हें हटाकर पुरानी परम्परा को फिर से अपनाया जाय। भवनों के बरामदों, दरवाजों-खिड़कियों पर 'खस' (या इस जैसी किसी और घास) के पर्दे लटकाये जायं और उन्हें भिंगोये रखने के लिए सामान्य 'यांत्रिक' व्यवस्था कर दी जाय।
13.   पॉलिथीन का विकल्प। जब तक प्रकृति में 'नष्ट' होने वाली पॉलिथीन का विकास नहीं हो जाता, तब तक के लिए पॉलिथीन के थैलियों पर शत-प्रतिशत प्रतिबन्ध लगा दिया और इसके विकल्प के तौर पर 'स्टॉकिनेट' (बनियान-जैसा जालीदार कपड़ा, जो काफी खिंच सकता है और जो मजबूत भी बहुत होता है) की थैलियों को बाजार में उतारा जाय।
14.   नाजुक पर्यावरण वाले क्षेत्र। जिन क्षेत्रों का पर्यावरण नाजुक है, वहाँ 'कंक्रीट' निर्माण तथा मोटर गाड़ियों का प्रवेश रोक दिया जाय। जहाँ तक सैलानियों एवं तीर्थयात्रियों की परेशानी का सवाल है; यह स्पष्ट कर दिया जाय- कि भ्रमण एवं तीर्थ यात्रा सिर्फ उनके लिए है, जो अपनी जरूरत का सामान खुद उठाने और मीलों पैदल चलने में सक्षम हैं- अन्यथा वे भ्रमण या तीर्थ का विचार दिमाग से निकाल दें!
उपसंहार
अगर हम उपर्युक्त चौदह सूत्रों को ईमानदारी और कठोरता पूर्वक लागू कर सकें, तो इसमें कोई शक नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के बच्चों को न केवल एक स्वस्थ पर्यावरण देकर जा सकते हैं, बल्कि इस अनन्त ब्रह्माण्ड में टिमटिमाती जीवन की इकलौती लौ को भी बचा सकते हैं। हालाँकि इन सूत्रों को लागू तो सरकार करेगी, पर अभियान चलाकर सरकार पर दवाब डालना हम नागरिकों का कर्तव्य है। 

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बचपन और हमारा पर्यावरण . योगेश कुमार गोयल

>> रविवार, 3 अप्रैल 2011

योगेश कुमार गोयल
समाचार-फीचर एजेंसियों ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ में प्रधान सम्पादक। राजनीतिक, सामयिक तथा सामाजिक विषयों पर विश्लेषणात्मक लेख, रिपोर्ट व सृजनात्मक लेखन। दैनिक भास्कर, पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, स्वतंत्र वार्ता, राजस्थान पत्रिका, नवभारत, लोकमत समाचार, रांची एक्सप्रेस, अजीत समाचार, पा×चजन्य, कादम्बिनी, शुक्रवार, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, विचार सारांश, इंडिया न्यूज इत्यादि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में विगत 20 वर्षों में विभिन्न विषयों पर 8500 से अधिक लेख, रिपोर्ट, फीचर इत्यादि प्रकाशित। आकाशवाणी रोहतक से दो दर्जन विशेष वार्ताएं प्रसारित। नशे के दुष्प्रभावों पर 1993 में ‘मौत को खुला निमंत्रण’ पुस्तक (पांच विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत), ‘हरियाणा साहित्य अकादमी’ के सौजन्य से 2009 में ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ पुस्तक तथा 2009 में ‘तीखे तेवर’ पुस्तक प्रकाशित। पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए जिला प्रशासन रोहतक, वाईएमसीए इंस्टीच्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, भारतीय दलित साहित्य अकादमी, विंध्यवासिनी जनकल्याण ट्रस्ट, अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन, अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, अनुराग सेवा संस्थान इत्यादि अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

सम्पर्क: मीडिया केयर ग्रुप, मेन बाजार बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105
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देश की राजधानी दिल्ली में विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्यों के कारण पेड़ों को काटने का सिलसिला वर्षों से बदस्तूर जारी है, इसके बावजूद यदि दिल्ली में हरित क्षेत्र बढ़ा है तो इसमें बच्चों के अमूल्य योगदान को नकारा नहीं जा सकता। दिल्ली सरकार के दावों पर यकीन करें तो विगत दस वर्षों में दिल्ली में हरित क्षेत्र में लगभग 15 गुना बढ़ोत्तरी हुई है। दरअसल इस दौरान दिल्ली में सैंकड़ों स्कूलों में बच्चों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति अनूठी चेतना जागृत की गई, जिसके चलते इको-क्लबों के जरिये जगह-जगह पौधे लगाए गए और बच्चों ने इन पौधों का लालन-पालन तथा पोषण अपने भाई-बहनों की भांति किया और इस तरह बच्चों की मदद से ही दिल्ली में लगभग 35 ‘नगर वन’ विकसित करने में मदद मिली और हर तरह के प्रदूषण से त्रस्त दिल्ली में हरित क्षेत्र बढ़ता गया है। पर्यावरण संरक्षण के अपेक्षित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देशभर के स्कूली छात्रों में आज ऐसी ही चेतना जागृत किए जाने की दरकार है।
            दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित मानती हैं कि यदि दिल्ली के बच्चों का सहयोग एवं योगदान नहीं मिला होता तो दिल्ली आज इतनी हरी-भरी नहीं होती, न ही इसकी हवा इतनी शुद्ध बनी होती,, दिल्ली में पटाखों से उपजे ध्वनि और वायु प्रदूषण पर भी लगाम नहीं लगी होती।
            आज विभिन्न माध्यमों से बच्चों को यह समझाया जाना बहुत जरूरी है कि पृथ्वी का लगातार बढ़ता तापमान और जलवायु में परिवर्तन न केवल भारत बल्कि दुनियाभर में मानव जीवन के लिए कितना गंभीर खतरा बनता जा रहा है। मौसम का बिगड़ता मिजाज मानव जाति, जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों के लिए तो बहुत खतरनाक है ही, पर्यावरण संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा है। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की विकराल होती समस्या के बारे में भी बच्चों को समय रहते पर्याप्त जानकारी देनी होगी, जिसके लिए औद्योगिक इकाईयों और वाहनों से निकलने वाली हानिकारक गैसें, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं, जिनका वायुमंडल में उत्सर्जन विश्वभर में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से तीव्र गति से बढ़ा है।
            देशभर में पर्यावरण प्रदूषण पर कुछ हद तक लगाम लग सके, इसके लिए हमें चाहिए कि हम बच्चों को दीवाली के दौरान पटाखे नहीं चलाने को प्रेरित करें। प्रतीक के तौर पर एक-एक फुलझड़ी चलाई जा सकती है किन्तु पटाखों की लड़ियां नहीं जलाने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है लेकिन इसके लिए बच्चों के समक्ष हमेें स्वयं को आदर्श बनाकर पेश करने की जरूरत है। कुछ स्थानों पर तो आजकल देखा भी जा रहा है कि बच्चों ने खुद अपने सप्रेम आग्रह से बड़ों को ही विवश कर दिया कि वे पटाखे न चलाएं। इसी प्रकार यह जानकर खुशी होती है कि कुछ स्थानों पर बच्चे अब होली का त्यौहार भी प्राकृतिक रंगों से न केवल अनोखे अंदाज में मनाते हैं बल्कि अपने इन प्रयासों से पर्यावरण की रक्षा में भी अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। यही नहीं, बिजली और पानी के संरक्षण के लिए भी जन-जागरूकता उत्पन्न करने का बहुत बड़ा दायित्व आज कहीं-कहीं बच्चे ही पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं। निसंदेह बच्चों की इन कोशिशों से न केवल वायु शुद्ध होती है बल्कि प्रदूषण के दानव का कद भी बौना होता है और वायु शुद्ध होने से मनुष्य की आयु भी बढ़ती है। देशभर में हर स्थान पर बच्चों में पर्यावरण संरक्षण का यह जज्बा पैदा करने की सख्त दरकार है।
            पर्यावरण को प्लास्टिक की थैलियों से बहुत बड़ा खतरा है, इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। दरअसल प्लास्टिक की थैलियों से न केवल पर्यावरण को बल्कि पशुओं को भी खतरा है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जगह-जगह पशु खाने की वस्तुओं के साथ-साथ प्लास्टिक की थैलियों को खा जाते हैं, जो कई बार उनकी मौत का कारण बनती हैं। प्लास्टिक की थैलियों के विकल्प के तौर पर अब बाजार में जूट, कागज, कपड़े और पर्यावरण अनुकूल सामग्री के बड़े सुंदर-सुंदर थैले दिखाई देने लगे हैं लेकिन प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध के बावजूद अभी भी इन थैलियों का खूब इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि कुछेक जगहों पर बच्चों के माध्यम से प्लास्टिक की थैलियों के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है और पर्यावरण अनुकूल विकल्पों का प्रचार किया जा रहा है लेकिन इस दिशा मेें अभी बहुत गंभीर प्रयासों की जरूरत है। पेंटिग्स, कहानी, कविता, लेख, स्लोगन प्रतियोगिताओं के जरिये बच्चों को पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभावों और पर्यावरण संरक्षण के सार्थक उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी देने और पर्यावरण संरक्षण में महत्ती भूमिका निभाने के लिए उन्हें प्रेरित करने की इस समय सख्त दरकार है।
            यह बात सही है कि बच्चे जब कुछ काम करने की ठान लेते हैं तो यह उम्मीद बन जाती है कि अब वह काम सिरे चढ़ने वाला है और उसके अनुकूल परिणाम निकलने वाले हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें इस दिशा में सार्थक प्रयास करना चाहिए कि बच्चों के दिलोदिमाग में धरती के संरक्षण एवं परिरक्षण का संदेश सदैव तरोताजा रहे। वैसे भी बच्चों की आवाज जितनी ज्यादा बुलंद होगी, उतनी ही जल्दी हम पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ जंग जीत सकेंगे। बच्चों को इस दिशा में जागरूक किया जाना भी बहुत जरूरी है कि हमें जो प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, वे काफी सीमित हैं और वे सदियों तक चलने वाले नहीं हैं, इसलिए उनके अंधाधुंध दोहन से यथासंभव बचें।

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बचपन और हमारा पर्यावरण---जी.के. अवधिया

>> गुरुवार, 31 मार्च 2011

परिचय
नामः जी.के. अवधिया
जन्म तिथिः 20-07-1950
जन्म स्थानः रायपुर
शिक्षाः बी.एससी

अपने बारे में-- मैं एक संवेदनशील, सादे विचार वाला, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हूँ। मुझे अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कट अभिलाषा है।

बचपन मनुष्य की वह अवस्था है जिसमें सीखने की सबसे अधिक ललक होती है क्योंकि एक बच्चे के लिए यह संसार एक अजूबा होता है तथा वह संसार को भली-भाँति जानने की चेष्टा करता है जिसके लिए नित नई-नई बातें सीखनी आवश्यक होती हैं। जितनी सीख बच्चे को अपने माता-पिता तथा गुरु से मिलती है उससे कहीं अधिक सीख उसे प्रकृति और पर्यावरण से मिलता है।

उषाकाल में आकाश की लालिमा, रक्तवर्ण सूर्य का उदय, लता-विटपों की हरीतिमा, सरिता का कलकल नाद के साथ प्रवाहित होना, गगनचुम्बी पर्वतमालाओं का सौन्दर्य जैसी प्राकृतिक दृश्य एवं प्राकृतिक क्रिया-कलाप मनुष्य के बचपन को जो ज्ञान प्रदान करती हैं वह जीवन भर के लिए उसके अचेतन मस्तिष्क की सम्पदा बनकर रह जाती हैं। मनुष्य के अचेतन मस्तिष्क में संचित पर्यावरण के द्वारा प्रदत्त यही ज्ञान मनुष्य के भीतर जीवनपर्यन्त भावनाएँ तथा संवेदनाएँ उत्पन्न करके उसे महान कलाकार, महान कवि, महान विचारक बनाता है।

पर्यावरण प्रदत्त इस ज्ञान से तो श्री राम जैसे ईश्वर के अवतार भी अछूते नहीं रह पाए हैं। बाल्यकाल में अयोध्या की भूमि, सर, सरोवर, नद्, पर्वत आदि से प्राप्त भावनाएँ और संवेदनाएँ ही वनवास के समय राम के मुँह से बरबस कहलवा देती हैं -

"हे जननी! तुम सदैव मेरे लिये प्रेरणामयी रही हो। तुम्हारी धूलि मुझे चन्दन की भाँति शान्ति देती है, तुम्हारा जल मेरे लिये अमृतमयी और जीवनदायी है।"

प्रकृति और पर्यावरण ही मनुष्य के सच्चे मित्र हैं, इसीलिए राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त जी अपने खण्डकाव्य "पंचवटी" में कहते हैं -

"सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥"

हमारा पर्यावरण सबसे अधिक प्रभावित हमारे बच्चों को ही करता है। बालकों की बाल-सुलभ जिज्ञासा और सीखने की ललक उन्हें पर्यावरण और प्रकृति के प्रति आकर्षित करती हैं। उषा की लालिमा, लता-विटपों-वृक्षों की हरीतिमा, सरिता का कलकल नाद, धरा से अम्बर का मिलन कराने की चेष्टा करने वाली पर्वतश्रेणियाँ बालकों के बालपन को जहाँ आह्लादित करती हैं वहीं उनके हृदय में भावनाओं तथा संवेदनाओं को जन्म देती हैं।

जरा अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए! क्या आपको ऐसा अनुभव नहीं होता था कि आकाश को ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, आम के बौर, पेड़ों की डालों में लगे स्वादिष्ट फल मनमोहक रंगों वाले फूल, पौधों के कोमल प्यारे पत्ते, झर-झर बहता पानी, सन-सन बहती हवा, सांझ की बेला में कलरव करते रंग-बिरंगे पंछी, हरे-भरे खेत, आदि, जो हमारे पर्यावरण के अंग हैं, हमारे ही जीवन के हिस्से हैं? इन सबके बगैर क्या आपका जीवन नीरस न हो जाता? क्या पर्यावरण के ये अंग आपके जीवन को ऊर्जा से भर नहीं देते थे?

आज धरा के गर्भ से विभिन्न खनिजों को प्राप्त करने के लिए और भूमि तथा पवर्तों को खोद डाला गया है और यह उत्खनन कार्य द्रुत गति से हुआ ही जा रहा है, वनों के वृक्षों को काट डाला गया है और बड़ी तेजी के साथ अभी भी काटा जा रहा है, सरिता के स्वच्छ जल में कारखानों की गंदगी को मिला डाला गया है और दिन-ब-दिन गंदगी बढ़ती ही जा रही है। क्या हमारे इन कार्यों से क्या प्रकृति का क्षरण और पर्यावरण का विनाश नहीं हो रहा है? हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि प्रकृति से सिर्फ प्राप्ति ही चाहते हैं और जिस प्रकृति से हमें प्राप्ति हो रही है उसकी प्रकृति के सन्तुलन के विषय में कुछ भी नहीं सोचते।

अधिक पुरानी बात नहीं है, महज चार सौ साल पहले याने कि सत्रहवीं शताब्दी तक हमारा देश विश्व का सर्वाधिक समृद्ध व धनाड्य देश था, देश में दूध-दही की नदियाँ बहती थीं और हमारा देश विश्व भर में "सोने की चिड़िया" के नाम से जाना जाता था। ऐसा सिर्फ इसीलिए था क्योंकि हमारे देश का पर्यावरण देश को प्रचुर मात्रा में शुद्ध जल, शुद्ध वायु, हरे-भरे वन आदि प्राकृतिक सम्पदा प्रदान करने में पूर्णतः समर्थ था।

आज हममें से अधिकतर लोगों की सन्तानों को प्रकृति के सौन्दर्य का दर्शन दुर्लभ हो गया है क्योंकि हमने अपने चारों ओर सीमेंट और कंक्रीट का जंगल बना डाला है। उषा की लालिमा जितना मन को मोहती है क्या विद्युत का कृत्रिम प्रकाश उतना ही मन को मोह सकता है? पर्वत के शिखर से प्राकृतिक रूप से झरता हुआ झरना हृदय को जितनी प्रसन्नता प्रदान करता है क्या सड़क के किनारे बनाया गया कृत्रिम रूप से बनाया गया तथा कृत्रिम प्रकाश से सजाया गया झरना हृदय को उतनी ही प्रसन्नता प्रदान कर सकता है? वनों में स्वच्छंद विचरण करने वाले वन्य पशुओं को देखकर जो आनन्द मिलता है, चिड़ियाघर में बन्द पशुओं को देखकर क्या वही आनन्द मिल सकता है?

पर्यावरण सदैव से मानव तथा उसके जीवन को प्रभावित करता रहा था, करता रहा है और करता रहेगा। हमारे पर्यावरण का अस्तित्व प्रकृति के कारण ही सम्भव है किन्तु दुःख की बात है कि आधुनिकता की दौड़ में अन्धे होकर हम प्रकृति को ही नष्ट किए जा रहे हैं। प्रकृति नष्ट होगी तो पर्यावरण भी प्रदूषित होकर नष्ट हो जाएगी जिसका परिणाम मानव के नाश के रूप में ही दृष्टिगत होगा। मानव का पूर्ण नाश तो जब होगा तब होगा, किन्तु प्रकृति के नाश तथा पर्यावरण के प्रदूषण ने हमारे बच्चों के बचपन का नाश करना अभी से ही जारी कर दिया है। यदि हमें हमारे बच्चों के बचपन को बचाना है तो हमें हमारे पर्यावरण को बचाना ही होगा।

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