पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं
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राहूल सिंह जी का आलेख

>> सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

राहुल सिंह रायपुर छत्तीसगढ

ब्लॉग सिंहावलोकन



सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ, जिस दिन पहला पेड़ कटा (छत्‍तीसगढ़ी में बसाहट की शुरुआत के लिए 'भरुहा' काटना मुहावरा है) और यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण का संकट आरे के इस्तेमाल के साथ शुरू हुआ। तात्पर्य यह कि पर्यावरण की स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से नहीं बल्कि दोहन से असंतुलित होती है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर को कृष्ण-मोरध्वज की कथा-भूमि माना जाता है। कथा में राजा द्वारा स्वेच्छापूर्वक आरे से आधा काट कर शरीर दान का प्रसंग है। स्थान नाम आरंग की व्युत्पति को भी आरे और इस कथा से संबद्ध किया जाता है। बहरहाल यह कथा छत्तीसगढ़ में पर्यावरणीय चेतना बीज के रूप में भी देखी जा सकती है।

कथा का असर, इतिहास में डेढ़ सौ साल पहले बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम ने दर्ज किया है कि अंचल में लगभग निषिद्ध आरे का प्रचलन मराठा शासक बिंबाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ के निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। अंचल में आरे के प्रयोग और आरा चलाने वाले पेशेवर 'अरकंसहा' को निकट अतीत तक महत्व मिलने के बाद भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था।


पर्यावरण का संरक्षण नीति और योजना मात्र से नहीं होगा, पर्यावरण को जीवन का समवाय महसूस करते रहना होगा। अन्यथा यह सब 'रस्मी' और पर्यावरण संरक्षण 'नारा' बनकर रह जाएगा। यदि पेड़ छाया के लिए और तालाब का निस्तारी इस्तेमाल नहीं रहा तो उन्हें सिर्फ पर्यावरण की दुहाई देकर बचाने का प्रयास संदिग्ध बना रहेगा। पीढ़ियों से इस्तेमाल हो रहे कुओं का नियमित उपयोग बंद होते ही उसके कूड़ादान बनते देर नहीं लगती। विश्व पर्यावरण दिवस का उत्साह कार्तिक स्नान और अक्षय नवमी, वट सावित्री, भोजली पर भी बना रहना जरूरी है। बसंत में टेसू, पलाश और आम के बौर देखने और कोयल की कूक सुनने की ललक रहे तो पर्यावरण रक्षा की उम्मीद बनी रहेगी। ज्यों माना जाता है कि शेर से जंगल की और जंगल से शेर की रक्षा होती है वैसे ही पर्यावरणीय उपादान, समुदाय की दिनचर्या के केन्द्र में हों, तभी उनका बचा रहना संभव होगा।


पिछले विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2009) पर सुभाष स्टेडियम कान्फ्रेंस हाल, रायपुर में नगर पालिक निगम एवं सिटी टेक्नीकल एडवायजरी ग्रुप के तत्वावधान में पर्यावरण संरक्षण पर संगोष्ठी आयोजित थी। कार्यक्रम के पहले अंधड़ और गरज-चमक के साथ बारिश हुई। बिजली गुल हो गई। कार्यक्रम मोमबत्ती जलाकर पूरा किया गया। उस दिन उत्‍पन्‍न व्‍यवधान आज प्रकृति की नसीहत जैसा लगता है। वैसे भी हमारी परम्परा में प्रकृति की विषमता को अनिवार्यतः विपक्ष के बजाय मददगार मानने की उदार सोच है। कालिदास पूर्वमेघ में उज्‍जयिनी पहुंचे मेघ से कहते हैं कि रमण हेतु जाती नायिका को बिजली चमका कर राह दिखाना, गरज-बरस कर डराना नहीं। एक गीत अनुवाद में यह भी जुड़ गया है कि चमक कर उसकी चोरी न खोल देना। पर्यावरण संरक्षण के लिए, प्रकृति अनुकूलन की ऐसी सोच को, इसमें निहित पूरी परम्परा को कायम रखने की जरूरत है।


पर्यावरण की चर्चा करते और सुनते हुए 'डरपोक मन' में यह आशंका भी बनी रहती है कि बाजारवाद के इस दौर में पर्यावरण की रक्षा करने के लिए कोई ऐसी मशीन न ईजाद हो जाए, जिसका उत्पादन बहुराष्ट्रीय कंपनियां करने लगे और वैश्विक स्तर पर हर घर के लिए इसे अनिवार्य कर दिया जाए।


ईश्वरीय न्याय की व्याख्या आसान नहीं लेकिन उससे न्याय की अपेक्षा करते हुए उसकी कृपा, उसके अनुग्रह की चाह सबको होती है। न्याय करते हुए फरियादी की व्यक्तिगत परिस्थितियों का ध्यान ईश्वर रखेगा (मेरा पक्ष लेगा), ऐसी कामना, यह विश्वास बना रहता है। लेकिन प्रकृति का न्याय पूरी तरह तटस्थ और पक्षरहित होता है, जिसमें पहले-पहल गलती होने के कारण 'रियायत' और बार-बार गलती की 'अधिक सजा' नहीं होती तो अच्छे कामों का पुरस्कार अनिवार्यतः, 'श्योर शाट गिफ्ट स्कीम' जैसा मिलता ही है। इसलिए प्रकृति के न्याय पर भरोसा रखें और पर्यावरण को विचार और चर्चा के विषय के साथ-साथ दैनंदिन जीवन से अभिन्न बने रहने की संभावना और प्रयास को बलवती करें। स्वामी विवेकानंद होते तो शायद कहते कि 'उठो, भगवान के भरोसे मत बैठे रहो, इसके लिए तुम्हें ही आगे आना होगा, हम सबको मिलकर बीड़ा उठाना होगा।

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दीप पर्व की शुभकामनाएं और ढेर सारी बधाई--"बचपन और पर्यावरण" पर लेख भेजें

>> शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

आज पर्यावरण की हानि होने से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से पूरी दुनिया को जुझना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान सामने आ रहे हैं। हम पर्यावरण की रक्षा करें एवं आने वाली पी्ढी के लिए स्वच्छ वातावरण का निर्माण करें। पर्यावरण के प्रति जागरुक करने के लिए हम एक प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं।प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सूचना एवं नियम इस प्रकार है।

विषय -- "बचपन और हमारा पर्यावरण"

प्रथम पुरस्कार
11000/= (ग्यारह हजार रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

द्वितीय पुरस्कार
5100/= (इक्यावन सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

तृती्य पुरस्कार
2100/= (इक्की्स सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

सांत्वना पुरस्कार (10)
501/=(पाँच सौ एक रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र


1. इस प्रतियोगिता में 1 नवम्बर 2010 से 30 नवंबर 2010 तक आलेख भेजे जा सकते है.

2. प्रतियोगिता में सिर्फ़ दिए गए विषय पर ही आलेख सम्मिलित किए जाएंगे।

3. एक रचनाकार अपने अधिकतम 3 अप्रकाशित मौलिक आलेख भेज सकता है पुरस्कृत होने की स्थिति में  वह केवल एक ही पुरस्कार का हकदार होगा.

4. स्व रचित आलेख  1 नवम्बर 2010 से 30 नवंबर 2010 तक lekhcontest@gmail.com  पर भेज सकते हैं. कृपया साथ में मौलिकता का प्रमाण-पत्र एवं अपना एक अधिकतम १०० शब्दों में परिचय तथा तस्वीर भी संलग्न करें। नियमावली की कंडिका 7 से संबंध नहीं होने का का भी उल्लेख प्रमाण-पत्र में करें। आलेख कम से कम 500 एवं अधिकतम 1000 शब्दों में होने चाहिए।

आपसे निवेदन है कि प्रत्येक रचना को अलग अलग इमेल से भेजने की कृपा करें. यानि एक इमेल से एक बार मे एक ही रचना भेजे.

5. हमें प्राप्त रचनाओं मे से जो भी रचना प्रतियोगिता में शामिल होने लायक पायी जायेगी उसे हमारे सहयोगी ब्लाग "हमारा पर्यावरण" पर प्रकाशित कर दिया जायेगा, जो इस बात की सूचना होगी कि प्रकाशित रचना प्रतियोगिता में शामिल कर ली गई है।

6. 1 दिसंबर 2010 से प्रतियोगिता में सम्मिलित आलेखों का प्रकाशन  "हमारा पर्यावरण" पर प्रारंभ कर दिया जायेगा.

7. इस प्रतियोगिता में हमारा पर्यावरण, एसार्ड, एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबंधित कोई भी व्यक्ति या उसका करीबी रिश्तेदार भाग लेने की पात्रता नहीं रखता।

8. इन रचनाओं पर  "हमारा पर्यावरण" का कापीराईट रहेगा. और कहीं भी उपयोग और प्रकाशन का अधिकार हमें होगा.

9. रचनाओं को पुरस्कृत करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ "हमारा पर्यावरण" के संचालकों के पास सुरक्षित रहेगा. इस विषय मे किसी प्रकार का कोई पत्र व्यवहार नही किया जायेगा और ना ही किसी को कोई जवाब दिया जायेगा.

10. इस प्रतियोगिता के समस्त अधिकार और निर्णय के अधिकार सिर्फ़  "हमारा पर्यावरण" के पास सुरक्षित हैं. प्रतियोगिता के नियम किसी भी स्तर पर परिवर्तनीय है.

11.पुरस्कार  IASRD द्वारा प्रायोजित हैं.

12. यह प्रतियोगिता पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने के लिए एवं हिंदी मे स्वस्थ लेखन को बढावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है.
(नोट:-प्रतियोगिता में ब्लॉग जगत के अलावा अन्य भी भाग ले सकते हैं प्रतियोगी की आयु 18 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए)

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पर्यावरण पर लेख भेजें--हजारों के इनाम पाएं !

>> सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ में जलावायु परिवर्तन के प्रति चेतना जगाने के लिए रायपुर जिले के समस्त स्कूलों में कार्यक्रम किए गए। अशोक बजाज जी के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को अच्छा प्रतिसाद मिला। कार्यक्रम के लिए पहल IASRD के अध्यक्ष के डी गुप्ता जी ने की थी। हमारे भी मन में आया कि सेतु बंध की गिलहरी सदृश्य पर्यावरण जागरण के महायज्ञ में अपनी भी एक आहुति दें, ब्लॉग जगत में एक आलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया जाए। इसकी चर्चा हमने अन्य मित्रों से की तो उन्होने भी अपना भरपुर सहयोग देने का वचन दिया। जिससे मेरा उत्साह वर्धन हुआ। हमारा उद्देश्य पर्यावरण के प्रति चेतना जागृति करना है। आज पर्यावरण की हानि होने से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से पूरी दुनिया को जुझना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान सामने आ रहे हैं। हम पर्यावरण की रक्षा करें एवं आने वाली पी्ढी के लिए स्वच्छ वातावरण का निर्माण करें। प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सूचना एवं नियम इस प्रकार है।

विषय -- "बचपन और हमारा पर्यावरण"

प्रथम पुरस्कार
11000/= (ग्यारह हजार रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

द्वितीय पुरस्कार
5100/= (इक्यावन सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

तृती्य पुरस्कार
2100/= (इक्की्स सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

सांत्वना पुरस्कार (10)
501/=(पाँच सौ एक रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र


1. इस प्रतियोगिता में 1 नवम्बर 2010 से 30 नवंबर 2010 तक आलेख भेजे जा सकते है.

2. प्रतियोगिता में सिर्फ़ दिए गए विषय पर ही आलेख सम्मिलित किए जाएंगे।

3. एक रचनाकार अपने अधिकतम 3 अप्रकाशित मौलिक आलेख भेज सकता है पुरस्कृत होने की स्थिति में  वह केवल एक ही पुरस्कार का हकदार होगा.

4. स्व रचित आलेख  1 नवम्बर 2010 से 30 नवंबर 2010 तक lekhcontest@gmail.com  पर भेज सकते हैं. कृपया साथ में मौलिकता का प्रमाण-पत्र एवं अपना एक अधिकतम १०० शब्दों में परिचय तथा तस्वीर भी संलग्न करें। नियमावली की कंडिका 7 से संबंध नहीं होने का का भी उल्लेख प्रमाण-पत्र में करें। आलेख कम से कम 500 एवं अधिकतम 1000 शब्दों में होने चाहिए।

आपसे निवेदन है कि प्रत्येक रचना को अलग अलग इमेल से भेजने की कृपा करें. यानि एक इमेल से एक बार मे एक ही रचना भेजे.

5. हमें प्राप्त रचनाओं मे से जो भी रचना प्रतियोगिता में शामिल होने लायक पायी जायेगी उसे हमारे सहयोगी ब्लाग "हमारा पर्यावरण" पर प्रकाशित कर दिया जायेगा, जो इस बात की सूचना होगी कि प्रकाशित रचना प्रतियोगिता में शामिल कर ली गई है।

6. 1 दिसंबर 2010 से प्रतियोगिता में सम्मिलित आलेखों का प्रकाशन  "हमारा पर्यावरण" पर प्रारंभ कर दिया जायेगा.

7. इस प्रतियोगिता में हमारा पर्यावरण, एसार्ड, एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबंधित कोई भी व्यक्ति या उसका करीबी रिश्तेदार भाग लेने की पात्रता नहीं रखता।

8. इन रचनाओं पर  "हमारा पर्यावरण" का कापीराईट रहेगा. और कहीं भी उपयोग और प्रकाशन का अधिकार हमें होगा.

9. रचनाओं को पुरस्कृत करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ "हमारा पर्यावरण" के संचालकों के पास सुरक्षित रहेगा. इस विषय मे किसी प्रकार का कोई पत्र व्यवहार नही किया जायेगा और ना ही किसी को कोई जवाब दिया जायेगा.

10. इस प्रतियोगिता के समस्त अधिकार और निर्णय के अधिकार सिर्फ़  "हमारा पर्यावरण" के पास सुरक्षित हैं. प्रतियोगिता के नियम किसी भी स्तर पर परिवर्तनीय है.

11.पुरस्कार  IASRD द्वारा प्रायोजित हैं.

12. यह प्रतियोगिता पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने के लिए एवं हिंदी मे स्वस्थ लेखन को बढावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है.
(नोट:-प्रतियोगिता में ब्लॉग जगत के अलावा अन्य भी भाग ले सकते हैं प्रतियोगी की आयु 18 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए)

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