पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं
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बचपन और पर्यावरण.---हरीश सिंह

>> गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

परिचय--हरीश सिंह
मैं उत्तरप्रदेश के संत रविदास नगर भदोही जनपद का रहने वाला हू. मेरी
शिक्षा  यही पर हुयी. १९८७ से समाचार पत्रों के जनवाणी, पाठकनामा आदि में
लिखने के साथ ही लेखन प्रति आकर्षित हुआ . १९९२ में भदोही से प्रकाशित एक
पाक्षिक अख़बार से जुडा. इसके बाद हिंदी दैनिक आज में लिखने लगा,
तत्पश्चात तीन वर्ष तक दैनिक जागरण में कार्य किया. मन उब गया तो उसे
छोड़कर न्यू कान्तिदूत टाइम्स में बतौर प्रधान संपादक के पद पर  कार्यरत
हुआ जो आज तक हू. इसके साथ ही आज अख़बार में विशेष संवाददाता के रूप में
कार्यरत हू.

जीवन के लिए खतरा बना पर्यावरण प्रदूषण
पर्यावरण प्रदूषण आज हमारे देश ही नहीं वरन पूरे विश्व की समस्या बनी हुई
है, जिसे लेकर आज पूरा विश्व परेशान है किन्तु इस प्रदूषण से निजात पाने
के लिए कोई कारगर उपाय नहीं ढूढे जा रहे है, जिसके कारण यह समस्या
दिनोदिन बढती जा रही है. प्रदूषण का अर्थ है प्राकृतिक संतुलन में दोष
पैदा हो जाना. शुद्ध वायु,शुद्ध जल, शुद्ध खाद्य पदार्थ और शांत वातावरण
का न मिलना ही प्रदूषण है . वायु,जल, और ध्वनि प्रदूषण को लेकर आज पूरा
विश्व परेशानी में पड़ा है.पर्यावरण प्रदूषण जीवन के लिए खतरा बन चुका
है.
    देखा जाय तो वायु प्रदूषण छोटे-छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक फैला
है. शुद्ध वायु पाने के लिए लोग ग्रामीण क्षेत्रों व पहाड़ी स्थलों की और
पलायन करते हैं. महानगरों में कल-कारखानों का धुवाँ, मोटर वाहनों का
धुवाँ इस तरह से फैला है की स्वस्थ वायु में साँस लेना भी दूभर हो गया
है. हमारे यहाँ कालीन नगरी में काती रंगाई के लिए लगे डाईंग प्लांट के
कारण छतो पर सूखने के लिए डाले गए कपड़ो पर काले कण जमा हो जाते है. यही
कण आंख में पड़कर आँखों की बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं तो स्वांस के
द्वारा फेफड़ो में पहुँच कर असाध्य रोगों को जन्म दे रहे रहे हैं. ऐसी
समस्या लगभग हर उन शहरों की है जहा सघन आबादी होने के पेड़ो का अभाव है
और वातावरण तंग है.

वायु प्रदूषण के अलावा सबसे विकट समस्या जल प्रदूषण की है. कल-कारखानों
का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है ,  इससे
अनेक बीमारियाँ पैदा होती है. कालीन नगरी में जल प्रदूषण की स्थिति भयावह
रूप धारण कर चुकी है. जनपद की आधी आबादी स्वच्छ जल से कोसो दूर है.सबसे
भयावह स्थिति भदोही नगर की है, जहा केमिकलयुक्त गन्दा पानी सीधे भूगर्भ
जल में प्रवाहित किया जा रहा है. जिसके कारण भूगर्भ जल में खतरनाक केमिकल
की मात्रा बढ़ गयी है. लाखो लीटर भूगर्भ जल का दोहन करने के उपरांत उसे
विषैला कर पुनः भूगर्भ जल में मिला दिया जाता है. जिससे उसमे व्याप्त
कार्बनिक व अकार्बनिक रसायन का तेजी से आक्सीकरण होता है. जैव आक्सीकरण
के कारण जल में उपस्थित घुलित आक्सीज़न की कमी इस हद तक पहुँच सकती है की
उससे जलीय प्राणियों की मौत तक हो सकती है.
 कालीन नगरी में डाईंग प्लांट के जहरीले जल को मिलाये जाने के गंभीर
परिणाम सामने आये हैं, कई मुहल्लों में अपाहिज  बच्चे पैदा हुए या फिर
पैदा होने के बाद अपाहिज हो गए . जनपद के एक भी स्थान पर  सीवर ट्रीटमेंट
प्लांट नहीं है. जबकि नगर के अन्दर इसकी उपलब्धता  काफी मायने रखती है.
चिकित्सको का कहना है की पानी में मिले जहरीले तत्व जैसे मैग्नेशियम  एवं
सल्फेट की उपस्थिति से आंतो में जलन व खराबी आती है. फ्लोराइड से
फ्लोरोसिस एवं नाइट्रेट  से मोग्लोविनेमिया नामक बीमारी हो सकती है.
पूर्व में केन्द्रीय भूगर्भ जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम नगर के कई
स्थानों से पानी का नमूना लिया था जाँच के उपरांत आंकड़ा चौकाने वाला था
विशेष रूप से आर्सेनिक व क्रोमियम की मात्रा चौंकाने वाली थी , प्रति
लीटर पानी में आर्सेनिक ३.४ मिली. व क्रोमियम २.९ मिली. पाई गयी . पानी
में बढ़ी क्रोमियम,सीसा व कैडमियम से कोम अल्सर, स्नायुमंडल पर
दुस्प्रभाव, रक्ताल्पता, सिर व जोड़ो में दर्द अनिद्रा,गुर्दे, फेफड़े व
दिल की बीमारी व   अपंग बच्चे पैदा हो रहे  है.

 तीसरा नंबर आता है ध्वनि प्रदूषण का. मनुष्य को रहने के लिए शांत
वातावरण चाहिए.  परन्तु आजकल कल-कारखानों का शोर , यातायात का शोर ,
मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों , लाउड स्पीकरों की कर्णभेदी  ध्वनि ने बहरेपन
और तनाव को जन्म दिया है. शहरो में बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण का परिणाम
साफतौर पर परिलक्षित हो रहा है देखा जाय बातचीत करने के दौरान हम ऊँची
आवाज़ में बात करने की आदत बना चुके है.


वातावरण में व्याप्त हो रहे  प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को
खतरा पैदा हो गया है ! खुली हवा में लम्बी साँस लेने तक को तरस गया है
आदमी ! गंदे जल के कारण कई बीमारियाँ फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य
के शरीर में पहुँचकर घातक बीमारियाँ पैदा करती हैं .   पर्यावरण-प्रदूषण
के कारण न समय पर वर्षा आती है , न सर्दी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है !
सूखा  , बाढ़  , ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है,
पर्यावरण में दिनों दिन बढ़ रहे प्रदूषण के कारण प्रकर्ति   ने भी अपना
संतुलन खो दिया है. समय चक्र का संतुलन डावाडोल हो रहा है. प्रदूषण को
बढ़ाने में कल-कारखाने , वैज्ञानिक साधनों का अधिक उपयोग , फ्रिज , कूलर
, वातानुकूलन , ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी हैं ! प्राकृतिक संतुलन का
बिगड़ना भी मुख्य कारण है ! वृक्षों को अंधा-धुंध काटने से मौसम का चक्र
बिगड़ा है ! घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण
बढ़ा है ! विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने के लिए चाहिए की अधिक से
अधिक पेड़ लगाए जाएँ , हरियाली की मात्रा  अधिक हो ! सड़कों के किनारे घने
वृक्ष हों ! आबादी वाले क्षेत्र खुले हों , हवादार हों , हरियाली से
ओतप्रोत हों,   कल-कारखानो को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले
प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचने चाहिए, पर्यावरण संतुलन को बचाने
के लिए पूरा विश्व चिंतित दिखाई दे रहा है, संगोष्ठी  आयोजित की जा रही
है. विचार विमर्श किये जा रहे है. लाखो-करोनो रुपये पानी की तरह बहाए जा
रहे है है. किन्तु अभी तक इसके सार्थक परिणाम दिखाई नहीं दे रहे है
दूसरी तरफ हमारी सोच संकुचित होती जा रही है. हम सोचते है की सिर्फ एक
आदमी के करने से क्या होगा किन्तु हमारी सबसे बड़ी कमी यही है. यदि
पृथ्वी पर रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति गंभीरता पूर्वक विचार करके इस विकट
समस्या के निस्तारण के बारे में नहीं सोचेगा तो इसका दुष्परिणाम हमें और
आने वाकी पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा ..

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बिगड़ता मिजाज मौसम का----योगेश कुमार गोयल

>> रविवार, 20 फ़रवरी 2011

योगेश कुमार गोयल
समाचार-फीचर एजेंसियों ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ में प्रधान सम्पादक। राजनीतिक, सामयिक तथा सामाजिक विषयों पर विश्लेषणात्मक लेख, रिपोर्ट व सृजनात्मक लेखन। दैनिक भास्कर, पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, स्वतंत्र वार्ता, राजस्थान पत्रिका, नवभारत, लोकमत समाचार, रांची एक्सप्रेस, अजीत समाचार, पा×चजन्य, कादम्बिनी, शुक्रवार, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, विचार सारांश, इंडिया न्यूज इत्यादि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में विगत 20 वर्षों में विभिन्न विषयों पर 8500 से अधिक लेख, रिपोर्ट, फीचर इत्यादि प्रकाशित। आकाशवाणी रोहतक से दो दर्जन विशेष वार्ताएं प्रसारित। नशे के दुष्प्रभावों पर 1993 में ‘मौत को खुला निमंत्रण’ पुस्तक (पांच विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत), ‘हरियाणा साहित्य अकादमी’ के सौजन्य से 2009 में ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ पुस्तक तथा 2009 में ‘तीखे तेवर’ पुस्तक प्रकाशित। पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए जिला प्रशासन रोहतक, वाईएमसीए इंस्टीच्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, भारतीय दलित साहित्य अकादमी, विंध्यवासिनी जनकल्याण ट्रस्ट, अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन, अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, अनुराग सेवा संस्थान इत्यादि अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

सम्पर्क: मीडिया केयर ग्रुप, मेन बाजार बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105


पर्यावरण संरक्षण को लेकर आज न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में चिन्ता निरन्तर गहरा रही है। दरअसल मौसम की मार अब किसी खास महीने में अथवा किसी खास देश पर देखने को नहीं मिल रही बल्कि मौसम की यह मार हर जगह, हर कहीं साल दर साल लगातार बढ़ रही है बल्कि अब तो ऐसा लगने लगा है, जैसे हर मौसम अपनी मारक क्षमता दिखाने के लिए ही आता है। गर्मी में जहां पारा 47-48 डिग्री तक जा पहुंचता है, वहीं सर्दियों में यह अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में भी लोगों को बुरी तरह कंपकंपा जाता है और बरसात में कहीं इस कदर बारिश होती है कि लोग बाढ़ की विभीषिका झेलने को विवश हो जाएं तो कहीं लोग वर्षा ऋतु में भी एक-एक बूंद पानी को तरसते दिखाई पड़ते हैं और अकाल की नौबत आ जाती है।
 कुछ वर्ष पूर्व जनवरी माह के शुरू में खासतौर से उत्तर भारत में मौसम ने जो सितम ढ़ाया था, उससे हर कोई हतप्रभ था। तब दिल्ली में जहां पारे ने 0.2 डिग्री पर पहुंचकर 70 साल का रिकार्ड ध्वस्त कर दिया था, वहीं कश्मीर की डल झील इस कदर जम गई थी कि लोगों ने उस पर जमकर क्रिकेट खेला, कुछ अन्य हिस्सों में पारा शून्य डिग्री से भी नीचे पहुंच गया था तो ठंडी जगह माने जाने वाले शिमला में उसी दौरान तापमान छह डिग्री दर्ज किया गया था। तब एक ओर जहां एकाएक बढ़ी ठंड ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर जान-माल को काफी नुकसान पहुंचाया था, वहीं जनवरी के दूसरे पखवाड़े में मौसम बहुत काफी गर्म रहा था। इसे मौसम का बिगड़ता मिजाज नहीं तो और क्या माना जाए?
 अमेरिका में कैटरीना और रीटा नामक तूफानों के चलते हुई भयानक तबाही, भारतीय उपमहाद्वीप में आया विनाशकारी भूकम्प, भारत में इस वर्ष कई राज्यों में आई भयानक बाढ़, क्या इन्हें भी प्रकृति का प्रकोप ही नहीं माना जाएगा? अंटार्कटिका में पिघलती बर्फ और वहां उगती घास ने भी सबको हैरत में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन यह सब हमारे दुष्कृत्यों का ही नतीजा है क्योंकि प्रकृति से हमारी छेड़छाड़ जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है तथा पर्यावरण संतुलन को हमने बुरी तरह बिगाड़ दिया है। हमारी लापरवाहियों का ही नतीजा है कि भूगर्भीय जल भी अब दूषित होने लगा है और बढ़ते प्रदूषण के चलते जहरीली गैसें ‘एसिड’ की बरसात करने लगी हैं।
 पृथ्वी का निरन्तर बढ़ता तापमान और जलवायु में लगातार हो रहे भारी बदलाव आज किसी एक देश के लिए नहीं बल्कि समूचे विश्व में मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। मौसम का बिगड़ता मिजाज मानव जाति, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए तो बहुत खतरनाक है ही, पर्यावरण संतुलन के लिए भी एक गंभीर खतरा है। हालांकि प्रकृति बार-बार अपने प्रकोप, अपनी प्रचंडता के जरिये हमें इस ओर से सावधान करने की भरसक कोशिश भी करती है पर हम हैं कि लगातार इन खतरों की अनदेखी किए जा रहे हैं। पर्यावरण का संतुलन जिस कदर बिगड़ रहा है, ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बचपन से ही हमें पर्यावरण की हानि से होने वाली गंभीर समस्याओं के बारे में सचेत किया जाए और यह सिखाया जाए कि हम अपने-अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में या भागीदारी निभा सकते हैं।
 विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 10 हजार वर्षों में भी पृथ्वी पर जलवायु में इतना बदलाव और तापमान में इतनी बढ़ोतरी नहीं देखी गई, जितनी हाल के कुछ ही वर्षों में देखी गई है। मौसम के इस बदलते मिजाज के लिए औद्योगिकीकरण, बढ़ती आबादी, घटते वनक्षेत्र, वाहनों के बढ़ते कारवां तथा तेजी से बदलती जीवनशैली को खासतौर से जिम्मेदार माना जा सकता है। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की विकराल होती समस्या के लिए औद्योगिक इकाईयों और वाहनों से निकलने वाली हानिकारक गैसें, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं, जिनका वायुमंडल में उत्सर्जन विश्वभर में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से काफी तेजी से बढ़ा है।
 पृथ्वी तथा इसके आसपास के वायुमंडल का तापमान सूर्य की किरणों के प्रभाव अथवा तेज से बढ़ता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने के बाद इनकी अतिरिक्त गर्मी वायुमंडल में मौजूद धूल के कणों एवं बादलों से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में लौट जाती है। इस प्रकार पृथ्वी के तापमान का संतुलन बरकरार रहता है लेकिन कुछ वर्षों से वायुमंडल में हानिकारक गैसों का जमावड़ा बढ़ते जाने और इन गैसों की वायुमंडल में एक परत बन जाने की वजह से पृथ्वी के तापमान का संतुलन निरन्तर बिगड़ रहा है। दरअसल हानिकारक गैसों की इस परत को पार करके सूर्य की किरणें पृथ्वी तक तो आसानी से पहुंच जाती हैं लेकिन यह परत उन किरणों के वापस लौटने में बाधक बनती है और यही पृथ्वी का तापमान बढ़ते जाने का मुख्य कारण है।
 जिस प्रकार वनस्पतियों के लिए (पौधों के शीघ्र विकास के लिए) बनाया जाने वाला ‘ग्रीन हाउस’ (शीशे का घर) सूर्य की ऊर्जा को इस ग्रीन हाउस के अंदर तो आने देता है लेकिन ऊष्मा को बाहर नहीं निकलने देता और परिणामतः ग्रीन हाउस के भीतर का तापमान काफी बढ़ जाता है, ठीक उसी प्रकार वायुमंडल में विभिन्न जहरीली गैसों की एक परत बन जाने से वह परत भी इस ग्रीन हाउस की भांति सूर्य की गर्मी को परत को पार करके पृथ्वी तक जाने तो देती है लेकिन वापस नहीं लौटने देती। इसी वजह से इस प्रक्रिया को ‘ग्रीन हाउस इफैक्ट’ कहा जाता है और हानिकारक गैसों की इस परत को ‘ग्रीन हाउस लेयर’ तथा इस परत के निर्माण में सक्रिय गैसों को ‘ग्रीन हाउस गैस’ कहा जाता है।
 मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों में ‘क्लोरो फ्लोरो कार्बन’ परिवार की गैसें शामिल हैं, जो औद्योगिक इकाईयों में बड़ी मात्रा में उपयोग की जाती हैं। इन गैसों में कोयले, पैट्रोल, डीजल, तेल, जीवाश्म ईंधन आदि से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस सर्वाधिक खतरनाक ‘ग्रीन हाउस गैस’ मानी जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार 1960 के बाद से ही वायुमंडल में इस गैस की मात्रा में 25 फीसदी वृद्धि हुई है। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ते जाने के साथ-साथ ज्यों-ज्यों वायमुंडल में ग्रीन हाउस लेयर की मोटाई बढ़ती जा रही है, पृथ्वी का तापमान भी उसी के अनुरूप लगातार बढ़ रहा है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछली सदी के दौरान वर्ष दर वर्ष पृथ्वी का तापमान बढ़ता रहा और पिछली सदी का अंतिम दशक तो विगत 1000 से भी अधिक वर्षों के मुकाबले बहुत ज्यादा गर्म रहा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में कोई भी जलवायु परिवर्तन इतनी तीव्र गति से नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी 50 वर्षों तक पर्यावरण प्रदूषण और पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी की यही गति जारी रही तो इस सदी के मध्य तक इस तापमान में 3 से 5 डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि हो सकती है और ऐसा हुआ तो ‘महाप्रलय’ की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान 2.8 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ने की संभावना है।
 इसलिए यदि समय रहते ग्रीन हाउस गैसों के वायुमंडल में उत्सर्जन पर अंकुश न लगाया गया तो आने वाले वर्षों में इसके बहुत विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। इससे विश्व भर में मौसम का संतुलन बुरी तरह डगमगा जाएगा और ऋतुओं का आपसी संतुलन बिगड़ जाने से एक प्रकार से महाप्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। पृथ्वी पर वायुमंडल का तापमान निरन्तर बढ़ते जाने से हिमशिखर पिघलते जाएंगे और इस तरह बर्फ पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा तथा समुद्र तल ऊंचे उठने व जलस्तर बढ़ने के कारण एक ओर जहां समुद्रों के किनारे बसे अनेक शहर जलमग्न हो जाएंगे, वहीं बाढ़ की विभीषिका भी उत्पन्न होगी तथा कृषि योग्य भूमि निरन्तर घटती जाएगी। इस प्रकार दुनिया भर में अकाल जैसी भयानक समस्या के सिर उठाने से करोड़ों लोग भूखे मरने के कगार पर पहुंच जाएंगे।
 बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग की समस्या जिस प्रकार निरन्तर विकराल होती जा रही है और मौसम के इस बदलते मिजाज का खामियाजा भी चूंकि विकसित देशों के बजाय विकासशील देशों को ही अधिक भुगतना पड़ता है, अतः विकासशील देशों को चाहिए कि वे अमेरिका सरीखे विकसित देश पर इस बात के लिए दबाव बनाएं कि वह प्रकृति के विरूद्ध अपनी छेड़छाड़ बंद कर पर्यावरण सुधार की मुहिम में अपना भी महत्वपूर्ण योगदान दे।
योगेश कुमार गोयल

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सीमा गुप्ता जी का आलेख "बचपन और पर्यावरण"

>> मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

पर्यावरण पर लेख प्रकाशन प्रारंभ कर रहे हैं। हमें सबसे पहले सीमा गुप्ता जी का लेख प्राप्त हुआ। विषय था "बचपन  और पर्यावरण"।

नाम :
सीमा गुप्ता
जन्म :
अम्बाला (हरियाणा) 11 oct
शिक्षा :
Master's Degree-Post Graduate (M.Com) from CH CHARAN SINGH UNIVERSITY
QUALIFIED “LEAD AUDITOR”  COURSE ( for quality system) FROM IRCA LONDON THROUGH M/S TQA DELHI IN JUNE’2000. CERTIFICATE NO. 10.00.92
लेखन और प्रकाशन :
 मेरी कई कविताएँ और नज्मे  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरी अधिकतर कविताओं में पीड़ा, विरह, बिछुड़ना और आँसू होते हैं; क्यों – शायद मेरे अन्तर्मन से उभरते हैं।
मेरी कविताएँ अंतरजाल पर “हिन्दी युग्म” "साहित्य कुंज" "स्वर्ग विभा " कवी मंच", "कथा व्यथा" "रचनाकार" मंथन " "और
पत्र पत्रिकाओं
"हरयाणा जगत" नव भारत टाईम्स, रेपको न्यूज़, राउंड द वीक दिल्ली , हमारा मेट्रो  ,सुखनवर , युध्भूमि,  और वाङ्मय त्रेमासिक  हिन्दी पत्रिका में भी प्रकाशित हो चुकी हैं।  
मेरा पहला काव्य संग्रह " विरह के रंग" शिवना प्रकाशन द्वारा May’2010  माह में प्रकाशित  हुआ

शायद आयु का पहला पडाव बचपन ही होता है. बचपन में अगर हम कहें तो सबसे अच्छा दोस्त शिक्षक भी  पर्यावरण  ही होता है.   पर्यावरण  का अभिप्राय है आसपास का प्राक्रतिक  सुन्दर  माहोल, विशाल पेड़ पोधो की हरयाली,  और पतझड़ सावन बसंत बहार जैसे  मौसम जो की जीवन के अनेक संदेशो से ओत प्रोत होता है .  जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उन्हें ये जानना जरूरी हो जाता है की जिस  ग्रह पर हमारा जीवन है, उसके प्रति उनकी क्या जिम्मेवारी  बनती है.  इस ग्रह के  भविष्य    को सुन्दर  और स्वच्छ   बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बच्चो को जागरूक करना  जरूरी हो गया  है.   आज के युग में जहां पर्यावरण की समस्या बेहद ही गंभीर होती जा रही है, वहां बच्चो के मन में प्रक्रति और  पर्यावरण की सुरक्षा के लिए एक जोश जाग्रत करना आवश्यक है. नीला स्वच्छ गगन, यहाँ वहां उड़ते  रुई के फाहों जैसे बादल के टुकड़े,  निर्मल जल से कल कल करती नदियाँ,  हरी भरी वादियाँ,  पर्वतों की आगोश से बहते झरने, हरे भरे विशाल दरख्तों के साए तले सांस लेती ये विशाल धरा , कौन से सोंदर्य की मोहताज है. प्रक्रति का ये  सौन्दर्य अतुलनीय है .   इसी प्रकति की गोद में खेल कर बचपन बड़ा होता है, प्रक्रति हमारी माँ हैं, और अपनी माँ के प्रति हर एक इन्सान का कर्तव्य बनता है की , अपनी माँ के इस अनोखे स्वरूप  की रक्षा करें. 
बचपन में ही बच्चो को शिक्षा के दौरान तस्वीरों द्वारा प्रकति की संचरना और उसके बहुमूल्य साधनों की रक्षा करना सिखाया  जाना चाहिए.  पर्यावरण सिर्फ किताबी न हो होकर हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंश होना चाहिए .    बच्चो को बारिश में नहाना और कागज की कश्ती बनाकर चलाना बहुत ही पसंद होता है, यदि उनके जेहन में ये डाला जाये की बारिश तभी होती है जब नये   पेड़ पोधे लगाये जाए और उनकी सुरक्षा की जाए, कचरा नदी नालो में ना बहाया जाये, बहुत ज्यादा शोर से बचा जाये तो  बच्चे अपने कोमल मन में  पर्यावरण  के महत्व को गहराई से बिठा लेंगे . बचपन में सीखी हुई बाते बच्चे  सारी उम्र   याद रखते हैं और उनका पालन करते हैं.  आज कोई गारंटी नहीं है की जन्म लेने वाला शिशु स्वस्थ ही पैदा होगा. आज चारो तरफ देखा जाए तो जैसे बचपन खो सा गया है, अकेला रह गया है,  न वो बारिश है जिसमे  कोई कागज की  कश्ती चल पाए, न वो पेड़ जहां बच्चे चोरी से चढ़ कर फल तोड़ लायें, ना वो  मखमली घास जहां बेठ] कर वो खेल पायें.  मानव कितना निर्मोही और निर्दय हो रहा है दिन प्रति दिन, अपने बच्चो का बचपन और प्रकति जैसा उसका  सच्चा  दोस्त भी छीन रहा है , सिर्फ अपने विकास और उन्नति की इस अंतहीन अंधी दौड़ में.  जिसका परिणाम बचपन में ही गंभीर बिमारियों से जूझते मासूम चहरो में नज़र आता है.
जिस रफ़्तार से हम विकास की और अग्रसर हो रहे हैं, हम भूल रहे हैं की ये रफ़्तार हमे वीनाश की और ले जा रहा है. पेड़ों  को जिस दरिंदगी से काटा जा रहा है,  कूड़ा कचरा और कारखानों से हानिकारक रसायन को नदियों में बहाया जा रहा है,   और    प्राक्रतिक साधनों का  तेजी से हम उपयोग कर उन्हें नष्ट करते जा रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब हम जीवन की चंद सांसो के लिए भी तरस जायेंगे.
हर मौसम अपनी समय सीमा भूल चूका है, जिस मौसम  का जब मन होता है आ धमकता है. न समय पर धुप, न सर्दी, न बारिश. फसलों की तबाही, किसानो की आत्महत्या , महामारी से जूझते शहर के शहर , आखिर कब हमरी ऑंखें खुलेंगी.
जो नदियाँ कभी अपनी निर्मल धारा के लिए जानी और पूजी जाती थी, अब वही कबाडखाना बन कर रह गयी हैं.   हरियाली और छावं देते ऊँचे   ऊँचे दरख्त अब दिखाई भी नहीं देते,. बेमौसम की बरसात, सुनामी, अधिक गर्मी, भूकंप, बाड़, जगह जगह आग उगलते   विशालकाय ज्वालामुखी  ये सब प्रक्रति के असंतुलन होने के ही नतीजे हैं. जिस तरह पूरी दुनिया में प्रक्रति का रोद्र रूप तबाही मचाने को आतुर हो रहा है, ये मानव के लिए चेतावनी है की , अब समय आ गया  है, ये धरती अब और अन्याय या अत्याचार नहीं सहेगी. इसकी सहनशीलता अब खतम  हो चुकी है.
 हजारो लाखो लोगो की तबाही से भी अगर हम नहीं सावधान होंगे तो कब होंगे, प्रलय कब दबे पावँ आ कर अपना बदला मानव से लेगी, इसका पता भी नहीं चलेगा. पर्यावरण दिवस मना कर   सिर्फ खाना पूर्ति न करें . ग्लोबल वार्मिंग का सिर्फ शोर मचाने से कुछ  नहीं होगा, गंभीर बिमारियों पर करोड़ो बहाने से भी कुछ नहीं होगा, शानो शौकत और दिखावे के लिए प्राक्रतिक साधनों का वीनाश करने से भी कुछ नहीं होगा.   होगा तो सिर्फ तब जब हर मनुष्य के हाथ में फावड़ा होगा, बीज होंगे , एक नन्हा सा पौधा होगा और एक संकल्प की हजारो पेड़ रोज लगायेंगे और उनकी सेवा अपने बच्चो की तरह करेंगे. उन्हें पुरे प्यार से पाल पोस कर बड़ा करेंगे और अपने पर्यावरण  की सुरक्षा आने वाली प्रलय से ऐसे करेंगे जैसे जांबाज सिपाही अपने देश की सीमा की करते हैं.  आने वाला विनाशकारी समय और प्रलय किसी दुश्मन से कम नहीं हैं.  धरती माँ का सीना चीर कर बनाई गयी ये विशाल इमारते, और टैकनोलजी सब कुछ धरा का धरा रह जाएगा. यही नहीं रीसायकल की प्रक्रिया को अपनाकर कचरा इस्तेमाल किया जा सकता है. कूड़ा कचरा या मंदिरों से निकले बासी फूलों को नदियों नालो में बहाने की बजाय धरती में ही दबा दिया जाए.  
 बर्फीली पहाड़ियों से उठ कर , अधखुली आँखों से झांकती भोर की निष्पक्ष किरणों  से  जब कुनमुनाता है  ठहरा  सागर  , नर्म घास की अंगड़ाइयों से महकने लगती है  फिजायें , धीमी गति से चुपचाप फिर ,कहीं हवाएं लेती हैं करवटें, कायनात की आगोश में सिमटा ,पवित्र सौंदर्य का  दिलकश मंजर, धरती के अलसाये   बदन पे, जैसे लिखा रहा हो जीवन बिंदु  की एक नई इबादत .  प्रक्रति का ये मोहक स्वरूप शायद हर कवी की कल्पना में होगा.
बेहद जरूरी है समय रहते, पर्यावरण  को पाठ्यक्रम का एक आवश्यक अंग बनाया जाये, और एक अलग महत्वपूर्ण विषय की तरह पढ़ाया जाये,  बच्चो का बचपन उन्हें लौटाया जाये. उन्हें सिखाया जाये की नन्हे पोधे उन्ही की तरह मासूम  हैं, उनकी रक्षा करना हर बच्चे का फर्ज है. 
प्रक्रति हमारी शालीन सभ्यता का प्रतीक है, पहाड़ी इलाके अपने रमणीक सुन्दर हरे भरे स्थानों के लिए विश्व में जाने जाते हैं.  ये धरती जो हमारे जीवन का सबब है, जो हमे जीवन देती है, उसकी सुरक्षा के लिए हमे वचन बध होना ही पड़ेगा.  ना करें हम अपनी माँ पर इतने अत्याचार की हम दाने दाने को भी मोहताज हो जाएँ.
स्वच्छ निर्मल पर्यावरण ही बचपन का भविष्य तय करता है, निरोगी काया , अच्छे संस्कार , सकारत्मक विचार धारा ये सब  पर्यावरण  ही की देन है. आओ हम सब आज ही यह प्रण करें की हर घर में हम एक पेड़ लगायें उसे पाले पोसें  , और अपनी जीवन दायनी धरती माँ को बचाएं. 

(seema gupta)
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