पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं

सीमा गुप्ता जी का आलेख "बचपन और पर्यावरण"

>> मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

पर्यावरण पर लेख प्रकाशन प्रारंभ कर रहे हैं। हमें सबसे पहले सीमा गुप्ता जी का लेख प्राप्त हुआ। विषय था "बचपन  और पर्यावरण"।

नाम :
सीमा गुप्ता
जन्म :
अम्बाला (हरियाणा) 11 oct
शिक्षा :
Master's Degree-Post Graduate (M.Com) from CH CHARAN SINGH UNIVERSITY
QUALIFIED “LEAD AUDITOR”  COURSE ( for quality system) FROM IRCA LONDON THROUGH M/S TQA DELHI IN JUNE’2000. CERTIFICATE NO. 10.00.92
लेखन और प्रकाशन :
 मेरी कई कविताएँ और नज्मे  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरी अधिकतर कविताओं में पीड़ा, विरह, बिछुड़ना और आँसू होते हैं; क्यों – शायद मेरे अन्तर्मन से उभरते हैं।
मेरी कविताएँ अंतरजाल पर “हिन्दी युग्म” "साहित्य कुंज" "स्वर्ग विभा " कवी मंच", "कथा व्यथा" "रचनाकार" मंथन " "और
पत्र पत्रिकाओं
"हरयाणा जगत" नव भारत टाईम्स, रेपको न्यूज़, राउंड द वीक दिल्ली , हमारा मेट्रो  ,सुखनवर , युध्भूमि,  और वाङ्मय त्रेमासिक  हिन्दी पत्रिका में भी प्रकाशित हो चुकी हैं।  
मेरा पहला काव्य संग्रह " विरह के रंग" शिवना प्रकाशन द्वारा May’2010  माह में प्रकाशित  हुआ

शायद आयु का पहला पडाव बचपन ही होता है. बचपन में अगर हम कहें तो सबसे अच्छा दोस्त शिक्षक भी  पर्यावरण  ही होता है.   पर्यावरण  का अभिप्राय है आसपास का प्राक्रतिक  सुन्दर  माहोल, विशाल पेड़ पोधो की हरयाली,  और पतझड़ सावन बसंत बहार जैसे  मौसम जो की जीवन के अनेक संदेशो से ओत प्रोत होता है .  जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उन्हें ये जानना जरूरी हो जाता है की जिस  ग्रह पर हमारा जीवन है, उसके प्रति उनकी क्या जिम्मेवारी  बनती है.  इस ग्रह के  भविष्य    को सुन्दर  और स्वच्छ   बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बच्चो को जागरूक करना  जरूरी हो गया  है.   आज के युग में जहां पर्यावरण की समस्या बेहद ही गंभीर होती जा रही है, वहां बच्चो के मन में प्रक्रति और  पर्यावरण की सुरक्षा के लिए एक जोश जाग्रत करना आवश्यक है. नीला स्वच्छ गगन, यहाँ वहां उड़ते  रुई के फाहों जैसे बादल के टुकड़े,  निर्मल जल से कल कल करती नदियाँ,  हरी भरी वादियाँ,  पर्वतों की आगोश से बहते झरने, हरे भरे विशाल दरख्तों के साए तले सांस लेती ये विशाल धरा , कौन से सोंदर्य की मोहताज है. प्रक्रति का ये  सौन्दर्य अतुलनीय है .   इसी प्रकति की गोद में खेल कर बचपन बड़ा होता है, प्रक्रति हमारी माँ हैं, और अपनी माँ के प्रति हर एक इन्सान का कर्तव्य बनता है की , अपनी माँ के इस अनोखे स्वरूप  की रक्षा करें. 
बचपन में ही बच्चो को शिक्षा के दौरान तस्वीरों द्वारा प्रकति की संचरना और उसके बहुमूल्य साधनों की रक्षा करना सिखाया  जाना चाहिए.  पर्यावरण सिर्फ किताबी न हो होकर हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंश होना चाहिए .    बच्चो को बारिश में नहाना और कागज की कश्ती बनाकर चलाना बहुत ही पसंद होता है, यदि उनके जेहन में ये डाला जाये की बारिश तभी होती है जब नये   पेड़ पोधे लगाये जाए और उनकी सुरक्षा की जाए, कचरा नदी नालो में ना बहाया जाये, बहुत ज्यादा शोर से बचा जाये तो  बच्चे अपने कोमल मन में  पर्यावरण  के महत्व को गहराई से बिठा लेंगे . बचपन में सीखी हुई बाते बच्चे  सारी उम्र   याद रखते हैं और उनका पालन करते हैं.  आज कोई गारंटी नहीं है की जन्म लेने वाला शिशु स्वस्थ ही पैदा होगा. आज चारो तरफ देखा जाए तो जैसे बचपन खो सा गया है, अकेला रह गया है,  न वो बारिश है जिसमे  कोई कागज की  कश्ती चल पाए, न वो पेड़ जहां बच्चे चोरी से चढ़ कर फल तोड़ लायें, ना वो  मखमली घास जहां बेठ] कर वो खेल पायें.  मानव कितना निर्मोही और निर्दय हो रहा है दिन प्रति दिन, अपने बच्चो का बचपन और प्रकति जैसा उसका  सच्चा  दोस्त भी छीन रहा है , सिर्फ अपने विकास और उन्नति की इस अंतहीन अंधी दौड़ में.  जिसका परिणाम बचपन में ही गंभीर बिमारियों से जूझते मासूम चहरो में नज़र आता है.
जिस रफ़्तार से हम विकास की और अग्रसर हो रहे हैं, हम भूल रहे हैं की ये रफ़्तार हमे वीनाश की और ले जा रहा है. पेड़ों  को जिस दरिंदगी से काटा जा रहा है,  कूड़ा कचरा और कारखानों से हानिकारक रसायन को नदियों में बहाया जा रहा है,   और    प्राक्रतिक साधनों का  तेजी से हम उपयोग कर उन्हें नष्ट करते जा रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब हम जीवन की चंद सांसो के लिए भी तरस जायेंगे.
हर मौसम अपनी समय सीमा भूल चूका है, जिस मौसम  का जब मन होता है आ धमकता है. न समय पर धुप, न सर्दी, न बारिश. फसलों की तबाही, किसानो की आत्महत्या , महामारी से जूझते शहर के शहर , आखिर कब हमरी ऑंखें खुलेंगी.
जो नदियाँ कभी अपनी निर्मल धारा के लिए जानी और पूजी जाती थी, अब वही कबाडखाना बन कर रह गयी हैं.   हरियाली और छावं देते ऊँचे   ऊँचे दरख्त अब दिखाई भी नहीं देते,. बेमौसम की बरसात, सुनामी, अधिक गर्मी, भूकंप, बाड़, जगह जगह आग उगलते   विशालकाय ज्वालामुखी  ये सब प्रक्रति के असंतुलन होने के ही नतीजे हैं. जिस तरह पूरी दुनिया में प्रक्रति का रोद्र रूप तबाही मचाने को आतुर हो रहा है, ये मानव के लिए चेतावनी है की , अब समय आ गया  है, ये धरती अब और अन्याय या अत्याचार नहीं सहेगी. इसकी सहनशीलता अब खतम  हो चुकी है.
 हजारो लाखो लोगो की तबाही से भी अगर हम नहीं सावधान होंगे तो कब होंगे, प्रलय कब दबे पावँ आ कर अपना बदला मानव से लेगी, इसका पता भी नहीं चलेगा. पर्यावरण दिवस मना कर   सिर्फ खाना पूर्ति न करें . ग्लोबल वार्मिंग का सिर्फ शोर मचाने से कुछ  नहीं होगा, गंभीर बिमारियों पर करोड़ो बहाने से भी कुछ नहीं होगा, शानो शौकत और दिखावे के लिए प्राक्रतिक साधनों का वीनाश करने से भी कुछ नहीं होगा.   होगा तो सिर्फ तब जब हर मनुष्य के हाथ में फावड़ा होगा, बीज होंगे , एक नन्हा सा पौधा होगा और एक संकल्प की हजारो पेड़ रोज लगायेंगे और उनकी सेवा अपने बच्चो की तरह करेंगे. उन्हें पुरे प्यार से पाल पोस कर बड़ा करेंगे और अपने पर्यावरण  की सुरक्षा आने वाली प्रलय से ऐसे करेंगे जैसे जांबाज सिपाही अपने देश की सीमा की करते हैं.  आने वाला विनाशकारी समय और प्रलय किसी दुश्मन से कम नहीं हैं.  धरती माँ का सीना चीर कर बनाई गयी ये विशाल इमारते, और टैकनोलजी सब कुछ धरा का धरा रह जाएगा. यही नहीं रीसायकल की प्रक्रिया को अपनाकर कचरा इस्तेमाल किया जा सकता है. कूड़ा कचरा या मंदिरों से निकले बासी फूलों को नदियों नालो में बहाने की बजाय धरती में ही दबा दिया जाए.  
 बर्फीली पहाड़ियों से उठ कर , अधखुली आँखों से झांकती भोर की निष्पक्ष किरणों  से  जब कुनमुनाता है  ठहरा  सागर  , नर्म घास की अंगड़ाइयों से महकने लगती है  फिजायें , धीमी गति से चुपचाप फिर ,कहीं हवाएं लेती हैं करवटें, कायनात की आगोश में सिमटा ,पवित्र सौंदर्य का  दिलकश मंजर, धरती के अलसाये   बदन पे, जैसे लिखा रहा हो जीवन बिंदु  की एक नई इबादत .  प्रक्रति का ये मोहक स्वरूप शायद हर कवी की कल्पना में होगा.
बेहद जरूरी है समय रहते, पर्यावरण  को पाठ्यक्रम का एक आवश्यक अंग बनाया जाये, और एक अलग महत्वपूर्ण विषय की तरह पढ़ाया जाये,  बच्चो का बचपन उन्हें लौटाया जाये. उन्हें सिखाया जाये की नन्हे पोधे उन्ही की तरह मासूम  हैं, उनकी रक्षा करना हर बच्चे का फर्ज है. 
प्रक्रति हमारी शालीन सभ्यता का प्रतीक है, पहाड़ी इलाके अपने रमणीक सुन्दर हरे भरे स्थानों के लिए विश्व में जाने जाते हैं.  ये धरती जो हमारे जीवन का सबब है, जो हमे जीवन देती है, उसकी सुरक्षा के लिए हमे वचन बध होना ही पड़ेगा.  ना करें हम अपनी माँ पर इतने अत्याचार की हम दाने दाने को भी मोहताज हो जाएँ.
स्वच्छ निर्मल पर्यावरण ही बचपन का भविष्य तय करता है, निरोगी काया , अच्छे संस्कार , सकारत्मक विचार धारा ये सब  पर्यावरण  ही की देन है. आओ हम सब आज ही यह प्रण करें की हर घर में हम एक पेड़ लगायें उसे पाले पोसें  , और अपनी जीवन दायनी धरती माँ को बचाएं. 

(seema gupta)
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9 टिप्पणियाँ:

जी.के. अवधिया 1 फ़रवरी 2011 को 8:21 pm  

"ये धरती जो हमारे जीवन का सबब है, जो हमे जीवन देती है, उसकी सुरक्षा के लिए हमे वचन बध होना ही पड़ेगा."

बिल्कुल सही बात कही है आपने!

संगीता पुरी 2 फ़रवरी 2011 को 11:41 am  

बेहद जरूरी है समय रहते, पर्यावरण को पाठ्यक्रम का एक आवश्यक अंग बनाया जाये, और एक अलग महत्वपूर्ण विषय की तरह पढ़ाया जाये, बच्चो का बचपन उन्हें लौटाया जाये. उन्हें सिखाया जाये की नन्हे पोधे उन्ही की तरह मासूम हैं, उनकी रक्षा करना हर बच्चे का फर्ज है.
बहुत सटीक लिखा है .. शुभकामनाएं !!

आलोकिता 2 फ़रवरी 2011 को 2:20 pm  

pathyakram mein to paryawaran ke bare mein padhaya hin jata hai magar mujhe lagta hai ki vyavharik roop mein jagrukta maa baap hi la sakte hain agar way jagruk honge to bachche bhi unhe dekh kar sikhenge hi kitab ki baaten bas pariksha tak hi simit rah jati hai (EVS--> Environmental Science puri tarah se prakruti se juda hin pathyakram hai jo schoolon mein padhaya ja raha hai)

Ek udaharan deti hun maine tution mein apne ek student ko samjhaya bijli ki bachat ke bare mein to usne faltu light fan off karna suru kar diya apne ghar mein to uski mummy boli bijli bill humlog ko thodi bharna padta hai wo to dadi bharegi tumhari didi rent par rahti hai na wo log ko bill dena padta hai isliye boli hai. Main stabdh thi jabtak maa baap jagruk na ho teacher ya pathyakram kuch nahi kar sakta jan jagrukta sabse aham pahlu hai.

Seema ji bahut si baten aapke lekh mein mujhe bahut hi achi lagi

निरामिष 2 फ़रवरी 2011 को 5:45 pm  

पर्यावरण पर गम्भीर आलेख!!
सीमा जी की जाग्रति सराहनीय है।
आपको साधुवाद इस प्रस्तुति के लिये!!

आभार

संजीव शर्मा 5 फ़रवरी 2011 को 8:54 pm  

पर्यावरण जैसी गंभीर समस्या पर सार्थक ढंग से प्रकाश डालने के लिए सीमा जी को साधुवाद...

संजीव शर्मा 5 फ़रवरी 2011 को 8:56 pm  

यदि हम सभी मिलकर पर्यावरण के प्रति इसीतरह सजग हो जाएँ तो बिगड़ते हालात दुरुस्त करने में देर नहीं लगेगी...शुरुआत के लिए सीमा जी का आभार

seema gupta 6 सितंबर 2011 को 12:38 pm  

maine ye aalekh aaj hi dekha, jane kaise reh gya. sabhi pathko ke comments ke liye dil se shukriya.
Regards
seema

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