पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं

"जल जो न होता तो ये जग जाता जल"

>> सोमवार, 13 सितंबर 2010

जल संरक्षण महाभियान पर विशेष 
चांदी सा चमकता ये नदिया का पानी , पानी की हर बूंद देती जिंदगानी !
अम्बर से बरसे जमीन पर मिले , नीर के बिना तो भैय्या काम ना चले ! ओ मेघा रे...
जल जो न होता तो ये जग जाता जल, गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल !


फिल्म "गीत गाता चल"के इस गीत के गायक श्री जशपाल सिंह को वर्ष १९७५ में यह एहसास हो गया था कि २०१० आते आते हम कितने जल संकट से घिर जायेंगे। आज चारों तरफ जल संकट को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा है तब इस गीत के भावार्थ को समझना प्रासंगिक हो गया है। आम आदमी से लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे सभी लोग जल संकट की चिंता में डूबे हैं। आज समूचा विश्व जल संकट से जूझ रहा है यहां तक कि भारत जैसे वनाच्छादित देश भी इससे अछूते नहीं हैं।हिम नदियां पिघल रही हैं,गंगोत्री पिघलकर प्रतिवर्ष 20  मीटर पीछे खिसक रही है। 
भारत-बांग्लादेश के मध्य स्थित विवादित द्वीप 'न्यू-मूर' जो 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला था, पूरी तरह समुद्र में समा गया है। 1954 के आंकड़ों के अनुसार यह समु्रद तल से 2-3 मीटर ऊंचाई पर था। सुंदरवन के अनेक द्वीपों का अस्तित्व खतरे में पड ग़या है। भारत की सीमा से लगे बंग्लादेश में कई क्षेत्रों के डूबने से प्रभावित लोग भारत में शरण ले सकते हैं। हमें याद है कि अक्टूबर 2009 में मालद्वीप को डूबने से बचाने के लिए वहां के राष्ट्रपति ने समुद्र के अंदर मंत्रिमंडल की बैठक करनी पड़ी थी। सदियों तक बाढ़,सूखा एवं अकाल के कारण जनता को जलसंकट एवं अन्न संकट से जूझना पड़ेगा। देश में गरीबी, बेकारी एवं भुखमरी की स्थिति निर्मित हो जाएगी। चारों तरफ डायरिया, मलेरिया एवं डेंगू जैसी घातक बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाएगा। लगातार सूखे के कारण मैदानी इलाकों से महापलायन  होगा।
दिल्ली,बंगलोर,हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, रायपुर, भोपाल एवं इंदौर जैसे शहरों में जनसंख्या का दबाव बढ़ने से इन शहरों की आधारभूत सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक  20 से 30  प्रतिशत के  तक पौधे तथा जानवरों की प्रजातियां विलुप्त  हो जाएंगी। वर्तमान में प्रति व्यक्ति पानी की खपत 1820 क्यूबिक मीटर है जो 2050 में घटकर 1140 क्यूबिक मीटर हो जायेगी। दरअसल यह दुष्परिणाम कोयला एवं तेल आधारित संयंत्रों के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण हो रहा है। ए.डी.बी.  की एक रिर्पोट के अनुसार आगामी 25वर्षों में एशिया में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तीन गुणा बढ़ जाएगा।
सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणों से मानव जगत को होने वाली क्षति का हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। यदि इस तथ्य पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो वर्ष 2050तक दुनिया का तापमान 2 सेल्सियस बढ़ जाएगा तथा जलवायु परिवर्तन की गति बढ़ जाएगी। इस बदलाव के साथ प्राणी एवं वनस्पति जगत को सामंजस्य बैठा पाना मुश्किल होगा। यदि समय रहते उपाय सोचे जाएं तो इस भयावह संकट से उबरा जा सकता है। केवल चर्चा एवं चिंता से कुछ नहीं होगा,बल्कि इसके लिए हमें व्यावहारिक रुख अपनाना होगा। क्योंकि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के लिए मनुष्य और केवल मनुष्य ही जिम्मेदार है। अत: मनुष्य को ही इसका उपाय ढूढ़ना होगा।
आने वाले समय में वैकल्पिक उर्जा स्रोतों का प्रचलन बढ़ाना होगा। उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पवन उर्जा, सौर उर्जा एवं जैविक उर्जा का उपयोग कर के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साईड की मात्रा को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही कृषि व वन क्षेत्र में नई तकनीक का उपयोग कर हम इस संकट से उबर सकते हैं। आने वाले समय में कम बिजली खपत करने वाले लाईटिंग उपकरण तथा कम ईंधन से चलने वाली गाड़ियों का इस्तेमाल करना लाजिमी हो गया है। शासन स्तर पर भी तेजी से प्रयास करना होगा। विश्व की कुल आय का मात्र तीन प्रतिशत भी यदि जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए खर्च किया जाय तो वर्ष 2030 तक तापमान वृध्दि को 2 सेल्सियस तक रोका जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस गंभीर समस्या से निबटने के लिए शासन जल संरक्षण महा अभियान चला रही है। इस महाभियान के माध्यम से पेयजल,निस्तारी जल एवं सिंचाई जल के स्रोतों में वृध्दि का उपाय ढूंढा जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह इस महाअभियान में स्वयं रुचि ले रहे हैं। उन्होंने वर्षा के जल को संग्रहित करने का प्लान बनाया है। यह महाभियान अनुकरणीय है।

15 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 13 सितंबर 2010 को 9:58 pm  

जल का जीवन में अत्यधिक महत्व है।
इसलिए जल का संरक्षण अत्यावश्यक है।
आपका हमारा पर्यावरण पर हार्दिक स्वागत है।
सार्थक लेखन के लिए आभार

ललित शर्मा 13 सितंबर 2010 को 9:59 pm  

जल का जीवन में अत्यधिक महत्व है।
इसलिए जल का संरक्षण अत्यावश्यक है।
आपका हमारा पर्यावरण पर हार्दिक स्वागत है।
सार्थक लेखन के लिए आभार

राधे 13 सितंबर 2010 को 10:07 pm  

राजस्थान में दिल्ली जयपुर रोड़ से 5 किलो मीटर पर हमारा गांव भानपुरा है। हमें पहले पानी लेने के लिए 2 किलो मीटर दूर जाना पड़ता था। जब से हमने बरसात के पानी को रोकना सीखा तब से हमारे गांव का जल स्तर बढ गया है। अब गांव के कुंओं में 12 महीने पानी रहता है। जल की समस्या से हम लोग निजात पा चुके हैं।
आपके ब्लाग पर आकर मुझे बहुत ही खुशी हुई। पर्यावरण के क्षेत्र में आप लोग अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं। मै आपको नमन करता हूँ।

राधेलाल जाट
सरपंच
ग्राम भानपुरा

अशोक बजाज 13 सितंबर 2010 को 10:11 pm  

त्वरित टिप्पणी के लिए आभार . पर्यावरण की सुरक्षा में अपना सहयोग एवम् मार्गदर्शन प्रदान करते रहें , धन्यवाद .

अशोक बजाज 13 सितंबर 2010 को 10:21 pm  

श्रीमान सरपंच महोदय ,

आपने बहुत अनुकरणीय कार्य किया है , अन्य पंचायतों को इससे प्रेरणा मिलेगी . हमको कभी जयपुर आने का अवसर मिला तो भनपुरा अवस्य आएँगे आपका प्लान देखनें ,त्वरित टिप्पणी के लिए आभार .

अल्पना 13 सितंबर 2010 को 10:23 pm  

पर्यावरण के प्रति जागरण के साथ-साथ धरातल पर भी काम आवश्यक है। जिसे हम जन सहयोग से ही मूर्त रुप दे सकते हैं।

पर्यावरण के प्रति जागरुकता एवं जन चेतना का स्वागत है।

हरीश 13 सितंबर 2010 को 10:29 pm  

Aaj pahali bar is blog par aana huaa. dekhkar khushi huyi ki koi to is sachche dil se es kaarya ko kar raha hai. Paryavaran ki raksha karke ham prakriti se liye huye karj ko hi chuka rahe hai.

मास्टर जी 13 सितंबर 2010 को 10:31 pm  

वाह बहुत सुंदर ब्लाग है
बढिया जानकारी हैं।
आपको धन्यवाद

ललित शर्मा 14 सितंबर 2010 को 8:11 am  

ओहो, सरपंच साब कांई हाल चाल है।
थ्हे घणा दिना पाछां मिल्या,कठे रह ग्या था।
जद म्हे चौमु आवां तो मिलस्यां थारा सुं।

राम राम

संगीता स्वरुप ( गीत ) 14 सितंबर 2010 को 8:31 am  

बहुत सार्थक और अच्छी जानकारी देता हुआ लेख ...आभार

Udan Tashtari 14 सितंबर 2010 को 9:30 am  

अच्छी जानकारी..


हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

रानीविशाल 14 सितंबर 2010 को 11:58 am  

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून
केवल चर्चा एवं चिंता से कुछ नहीं होगा,बल्कि इसके लिए हमें व्यावहारिक रुख अपनाना होगा। क्योंकि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के लिए मनुष्य और केवल मनुष्य ही जिम्मेदार है। अत: मनुष्य को ही इसका उपाय ढूढ़ना होगा।
बिलकुल सही बात ...आभार
यहाँ भी पधारिये
http://kavyamanjusha.blogspot.com/
http://anushkajoshi.blogspot.com/

अशोक बजाज 14 सितंबर 2010 को 10:50 pm  

ग्राम चौपाल: बच्चों ने लिया पर्यावरण बचाने का संकल्प

Apanatva 20 सितंबर 2010 को 8:17 pm  

ek aise gaon me paida huee janha na bijlee thee na panee use samay .Nagaur me meelo chalkar Ginanee nadee se panee sir par ghado me bharkar laya jata tha ....samay nikal gaya aapkee post yade tazaa kar gayee.....Sarpanch jee ka comment to kitnee khushiya de gaya iseka aap andaz bhee nahee laga sakte .
Aabhar.
aapke prayas prashansneey hai .

एक टिप्पणी भेजें

हमारा पर्यावरण पर आपका स्वागत है।
आपकी सार्थक टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती हैं।

  © Blogger template Webnolia by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP