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पर्यावरण संरक्षण में शिक्षक की महती भूमिका

>> सोमवार, 6 सितंबर 2010

डॉक्टर सर्व पल्ली राधा कृष्णन का जन्म दिन शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधा कृष्ण की इच्छा थी कि उनका जन्म दिन शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाय। आज 5 सितम्बर को गुरुवों के सम्मान दिवस के रुप में वही मान्यता मिल चुकी है, जो हिन्दु कैलेंडर में गुरु पूर्णिमा की है।वैदिक काल में शिक्षा गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। जहां विद्यार्थी को सम्पूर्ण शिक्षा दी जाती थी। विद्यार्थियों को शिक्षा आचार्यों के माध्यम से मिलती थी। वैसे बालक की प्रथम गुरु माता को कहा गया है। वेद कहते हैं "माता निर्माता भवति" अर्थात माता ही निर्माण करती है। उसके पश्चात गुरु को द्वितीय शिक्षक की मान्यता मिली है। विद्यार्थी का प्रवेश गुरुकुल में श्रावणी पर्व को होता था। अर्थात श्रावण मास की पूर्णिमा को जहां उसके उपनयन संस्कार के साथ गुरुकुल प्रवेश कराया जाता था एक उत्सव के रुप में। विद्यार्थी के शिक्षा प्राप्ति की दिशा में यह प्रथम चरण माना जाता था।
आचार्य विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र के माध्यम से विद्याथियों को शिक्षा देने के एक नवीन उपाय का प्रादुर्भाव किया। उन्होने रोचक ढंग से वनों एवं उसमें विचरण करने वाले पशु पक्षियों के माध्यम से राजकुमारों को शिक्षा दी। इस तरह शिक्षा देने का सबसे बड़ा कारण यह था कि विद्याध्ययन में रोचकता बनी रहे। विद्याध्ययन एक बोझ न बन जाए विद्यार्थी के लिए। नीति शास्त्र की शिक्षा भी इसके साथ-साथ मिलती रहे। क्योंकि संसार को सुचारु रुप से अनुशासन के साथ चलाने के लिए नैतिकता की प्रमुख आवश्यकता होती है। जिससे प्रजा शासनारुप व्यवहार करती है।
आचार्य विष्णु शर्मा ने विद्यार्थियों के अध्ययन में वन एवं वन्य प्राणियों का प्रयोग किया। इसका प्रमुख कारण यह था कि विद्यार्थी अपने परिवेश के साथ भी जुड़ा रहे। अपने वातावरण के साथ भी जुड़ा रहे। जिससे उसे पर्यावरण की रक्षा करने की सीख भी मिले। क्योंकि वनों एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण से हमारा वातावरण शुद्ध एवं निवास के लायक रह सकता है। इस विषय पर हमारे मनीषि पूर्व में शोध कर चुके थे। वैदिक काल में जीविका वनों पर आधारित थी।
पर्यावरण के प्रति जागरुकता में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब से शिक्षा के क्षेत्र में मैकाले पद्धति ने प्रवेश किया, तब से प्राचीन ग्रंथों के अध्यापन प्रतिबंध लगा दिया गया और यह पद्धति अंग्रेजों के जाने के बाद भी अनवरत जारी है। जिससे विद्यार्थी बचपन से पर्यावरण की शिक्षा से विमुख रहे। शिक्षकों ने भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति विद्यार्थियों को जागरुक करने कोई विशेष भूमिका नहीं निभाई जिसके फ़लस्वरुप पर्यारवरण को इतना ज्यादा नुकसान हुआ कि शहर और गाँव दोनो ही प्रभावित हुए हैं।
"केरा तबहिं न चेतिया जब ढींग लागी बेर" यह उक्ति यहां पर चरितार्थ होती है। अंधाधुंध वन काटे गए, पहाड़ों का सीना चीर एवं धरती के गर्भ से खनिजों का दोहन किया गया। कल कारखानों के अवशिष्ट पदार्थों पूण्य सलिला नदियों में बहाया गया। जिससे नदियाँ भी प्रदुषित हुई। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज हमें स्वच्छ जल मिलना भी कठिन है। हमारे जलों के स्रोत सूख रहे हैं। जल स्तर तलहटी में जा रहा है। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हूई है। आगे चल कर पर्यावरण के खिलवाड़ करने एवं शिक्षकों तथा शासन की उदासीनता के फ़लस्वरुप हमें भयंकर स्थिति का सामना करना पड़ेगा।
इसलिए शिक्षक दिवस के अवसर सभी शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को समझें एवँ पर्यावरण के प्रति विद्याथियों को शिक्षित करें। जिससे उनमें पर्यावरण की रक्षा करने की जागरुकता आए। यह कार्य अत्यावश्यक इसलिए है कि विद्यार्थी के कोमल मन मस्तिष्क पर  बचपन में प्राप्त ज्ञान की अमिट छाप रह्ती है और वह इसे जीवन भर नहीं भूलता। इसलिए पर्यावरण  संरक्षण में शिक्षक की महती भूमिका है, इससे इंकार नही किया जा सकता।

13 टिप्पणियाँ:

ashokbajajcg.com 7 सितंबर 2010 को 12:03 am  

बहुत बढ़िया .


कृपया इसे भी पढ़े -------

http://ashokbajaj99.blogspot.com/2010/08/blog-post_9164.html

ब्लॉ.ललित शर्मा 7 सितंबर 2010 को 1:07 am  

शिक्षक जिम्मेदारियों का नाम है।

शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ कहता है-मातृमान पितृमान आचार्यवान पुरुषो वेदा:
इसलिए पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी सभी नागरिकों की बनती है।
और जो अपने को पढे लिखे कहते हैं उनकी और भी ज्यादा। क्योंकि वे ही लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।

जय हिंद

Unknown 7 सितंबर 2010 को 1:09 am  

पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरुक करना एक महत्वपूर्ण कार्य है और इस कार्य को आप ब्लॉग के माध्यम से कर रही हैं। नि:संदेह आप बधाई की पात्र हैं।

Unknown 7 सितंबर 2010 को 1:10 am  

पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरुक करना एक महत्वपूर्ण कार्य है और इस कार्य को आप ब्लॉग के माध्यम से कर रही हैं। नि:संदेह आप बधाई की पात्र हैं।

Unknown 7 सितंबर 2010 को 1:10 am  

पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरुक करना एक महत्वपूर्ण कार्य है और इस कार्य को आप ब्लॉग के माध्यम से कर रही हैं। नि:संदेह आप बधाई की पात्र हैं।

Unknown 7 सितंबर 2010 को 1:10 am  

ललित शर्मा जी से सहमत

Unknown 7 सितंबर 2010 को 1:12 am  

पर्यावरण संरक्षण में शिक्षक की महती भूमिका है, इससे इंकार नही किया जा सकता।

आपने सही कहा है,पर्यावरण पर आपसे और भी सामग्री की आशा है।
कृपया नित्य लेखन करें।

रानीविशाल 7 सितंबर 2010 को 10:41 pm  

बिलकुल सही ...बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर
जारी रखिये
आभार

Aditi Deshpande 7 सितंबर 2010 को 11:18 pm  

बहुत ही सारगर्भित है इससे हमे सीख मिलती है कि पर्यावरण का हमारे जीवन मे क्या महत्व है।

Asha Joglekar 8 सितंबर 2010 को 11:09 pm  

बहुत ही सार्थक लेख । इस दिन बच्चों को स्कूल में बंद रखने के बजाये पर्यावरण की गिरती हुई स्थिति से वाकिफ कराना होगा और उसे सुधारने के उपायों पर उनसे अमल भी करवाना होगा ।

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