पर्यावरण बचाना है--सबको पेड़ लगाना है!!---धरती हरी भरी रहे हमारी--अब तो समझो जिम्मेदारी!! जल ही जीवन-वायू प्राण--इनके बिना है जग निष्प्राण!!### शार्ट एड्रेस "www.paryavaran.tk" से इस साईट पर आ सकते हैं
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बचपन और हमारा पर्यावरण--अविनाश वाचस्‍पति

>> शुक्रवार, 20 मई 2011

अविनाश वाचस्‍पति : परिचय
14 दिसम्बर 1958 में जन्म। भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचार परिचय', तथा हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम’।  दैनिक समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, अंतर्जाल पत्रिकाओं इत्यादिमें रचनाएं प्रकाशित। अनेक काव्‍य संग्रहों में कविताएं शामिल। वर्ष 2008 और वर्ष 2009 में यमुनानगर, हरियाणा में आयोजित हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में फिल्मोत्सव   समाचार के तकनीकी संपादक।
शहर में हैं सभी अंधे (1994), तेताला काव्‍य संग्रह (1984) में  संपादन/प्रकाशन। नवें दशक के प्रगतिशील कवि कविता संग्रह के प्रमुख हस्‍ताक्षर। हाल ही में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति पुस्‍तक का सह-संपादन।
'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' ,हास्य व्यंग्य श्रेणी में संवाद सम्‍मान, लोकसंघर्ष परिकल्पना सम्मान 2010 में वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार । कविता पुस्‍तक शहर में हैं सभी अंधे पर साहित्‍य शिल्पी सम्मान। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से वर्ष 2008-2009 के लिए हिंदी साहित्य सम्मान ।
हिंदी ब्लॉग नुक्‍कड़ , पिताजी, बगीची, अविनाश वाचस्‍पति, झकाझक टाइम्‍स  इत्यादि   मिलाकर 30 से अधिक हिन्‍दी ब्‍लॉगों पर सक्रिय। सोपानस्‍टेप मासिक,  डीएलए में साप्ताहिक व्यंग्य लेखन लेखन।
संपर्क--:  साहित्‍यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्‍त नगर, नई दिल्‍ली 110065 मोबाइल 09868166586/09717849729 ई मेल पता nukkadh@gmail.com, tetaalaaa@gmail.com
संप्रति -- फिल्‍म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली में कार्यरत्।

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लेख का विषय बहुत माकूल है और प्रासंगिक भी।  पर्यावरण को सुधारने और बिगाड़ने संबंधी मानवीय चिंतायें बेहद चिंतनीय हैं। व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाये तो बचपन के पर्यावरण को सबसे स्‍वच्‍छ पाया गया है। आपने वह फिल्‍मी गीत सुना ही नहीं होगा बल्कि जहन में अब भी गूंज रहा होगा। नन्‍हा मुन्‍ना राही हूं, देश का सिपाही हूं, मेरे साथ मिलकर बोलो, जयहिन्‍द, जयहिन्‍द, जयहिन्‍द।

बचपन के पर्यावरण की यह निश्‍छलता  देश काल की सीमाओं से बाहर अपने अक्षितिजीय मनभावन स्‍वरूप में संपूर्ण सृष्टि में नेह बरसा रही है। बचपन में हम पैंया पैंया चलते रहे हैं और उससे भी पहले घुटनों के बल खिसकते रहे हैं। बिना कहे, बिना सुने अपने विचारों के जरिए अनुभवों की सैर का आनंद लेते रहे हैं। खिसकने से पैदल चलने का यह सफर, पैदल के बाद साईकिल की सवारी, साईकिल के बाद किशोर होने पर मोटर साईकिल और स्‍कूटर पर उतर चढ़त, फिर कार, बस, सारे चौपहिये वाहन, और फिर इससे आगे बढ़कर रेल, जिसके पहिये गिने तो जा सकते हैं, पर कोई गिनता नहीं है, सिवाय उनके जिन्‍हें उनका गिन गिनकर  हिसाब रखना होता है।

गिनता है बचपन में बच्‍चा, सिर्फ रेल के पहिये ही नहीं, कितनी चींटियां जमीन पर चल रही हैं, कितने मच्‍छर उड़ रहे हैं, कितने कुत्‍ते भौंक रहे हैं, कितनी मक्खियां हैं, उन्‍हें मारने की कोशिश करता बचपन, बचपन में क्रूरता का समावेश करता चलता है। वो गिनता तो है उन रोटियों को भी जिनसे वो अपने पेट की भूख मिटाता है, भाई बहनों को भी जिनके साथ रहता है, दोस्‍तों पड़ोसियों को, इन पर प्‍यार लुटाता है, माता पिता को, हितैषियों को जिनसे असीम प्‍यार दुलार पाता है। देखता है उस इंसान के बारे में जो मुंह से धुंआ उगलता दिखलाई देता है। धुंआ सिर्फ धूम्रपान का ही नहीं, अपशब्‍दों की बारिश भी, जिनसे रोजाना रूबरू होता है। वहीं से सही-गलत सब सीखता बढ़ता रहता है। जबकि वो घट रहा होता है। दिन, शरीर के स्‍तर पर और वैचारिक स्‍तर पर बढ़ रहा होता है। अनुभवों के मायने में समृद्धत्‍व को प्राप्‍त हो रहा होता है। पर इस गिनती में कोई स्‍वार्थ नहीं होता। स्‍वार्थ से बचा रहे ऐसा नहीं होता।

यह अच्‍छा है तो मेरा है, मेरे भाई का है, मेरी बहन का है, मेरे मित्र का है, मेरे पिता का है, माता का है और जो बुरा है वो तेरा है, किसी अनजाने का है। जबकि अनजाना कौन है, सबमें मानवमन समाया है। बचपन में मच्‍छरों, चींटियों, मक्खियों को मारने से उपजी क्रूरता बचपन को मार देती है। थोड़ा और बढ़े होने पर सांप, बिच्‍छू को मारना। जबकि वही जब किसी कुत्‍ते के पिल्‍ले को, बिल्‍ली को, गिलहरी को दुलार करती है तो बचपन का आनंद कई सौ गुना बढ़ जाता है। इनके अच्‍छे प्रभाव से हम इंसानियत के पर्यावरण को सब सुधरता हुआ देखते हैं।

जमीन पर दौड़ने में फास्‍ट मेट्रो,  उसके बाद हवाई जहाज की रनवै पर तेज दौड़, भला उससे कौन करेगा होड़ – पर उससे भी होड़ जारी है – सबसे तेज विचारों की सवारी है। इन विचारों का पर्यावरण स्‍वच्‍छ है, तो प्रत्‍येक मन गंगा है, मन कठौती है और विचार गंगा है। किसी का मन नहीं बुराईयों से रंगा है। बचपन स्‍नेह का अपनाबन। बनना, बनना और मन का  सबसे बंधते जाना। 

अब इस पर्यावरण पर भी खूब खतरा तारी हो रहा है। बचपन वो बचपन नहीं रहा, जो देश को, संसार को अपने बचपने से लुभाये। अब बचपना आधुनिकता के मकड़जाल में उलझ गया है और इस बुरी तरह से उलझ गया है कि सुलझाये नहीं सुलझ रहा है। फास्‍टता इतनी अधिक और इतनी तेजी से समाती जा रही है बल्कि बरगलाती जा रही है कि फूड बन रहा है फास्‍टफूड, भाषा बन रही है फास्‍टभाषा (एस एम एस और चैनलों की भाषा पर गौर कीजिए और यही बन रही है अखबारों में खबरों की भाषा), फास्‍टमेट्रो, फास्‍टजहाज (चाहे युद्धक सही, पर युद्ध बुराईयों से तो है सही परंतु युद्ध नहीं सही, जो बचपन के विरुद्ध लड़ा जा रहा है) , फास्‍टमोबाइल, जो सभ्‍यता और संस्‍कृति को बच्‍चों से दूर ले जा रहा है,  इन्‍हें भटका रहा है और ये बचपन मटक रहा है,  अच्‍छाईयों को गटक रहा है। इसमें न अटकें, इससे बचें और बाहर निकलें, तभी बचपन का पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, चाहते सब हैं परंतु बचपन में इस भंवर में फंसने के बाद, बड़े होने पर समझते हैं, अहसासते हैं पर समय से क्‍या करें, आप ही ढूंढ़ कर बतलायें कोई कारगर उपाय।

पर एक फास्‍टता सबको लुभा रही है और उसके जरिए हमारी सबकी प्‍यारी हिन्‍दी समूचे संसार में अपना सिक्‍का जमा रही है। सिक्‍का जो सोने का नहीं है, डायमंड का नहीं है और न ही है चांदी का। वह सिक्‍का है इंटरनेट पर हमारी हिन्‍दी की भूमंडलीय सार्थक उपस्थिति। हिन्‍दी जिसने हिन्‍दी फिल्‍मी गीतों के जरिए पूरे विश्‍व में हिन्‍दी के पर्यावरण को महकाया, उसे और फास्‍टता के साथ इंटरनेटीय तीव्रता से सुगंधित कर रही है। पूरे विश्‍व को हिन्‍दीहोम बना रही है। आप जान लीजिए कि पूरे समूचे विश्‍व को हिन्‍दीहोम सिर्फ हिन्‍दी के द्वारा ही बनाया जा सकता है, हिन्‍दी प्रेमी ही बना सकता है और समूचा जगत हिन्‍दी प्रेमी बनता जा रहा है।

पर्यावरण पर चढ़े हुये छद्म आवरण को वरण मत कीजिए। बचपन से ही तज दिया जाये, ऐसा कारगर उपाय कीजिए। बचपन पर बच्‍चों का ही नहीं, सबका मन अहसास करे सुंदर सलोने बचपनीय मन का। शरीर की प्रत्‍येक रक्‍तवाहिनी में, नस नाड़ी में, विचारों की गाड़ी में बचपन ही सवार नजर आए। हर नजर खिलखिलाए। पर्यावरण प्रत्‍येक मन का अंदर तक सुंदर बना रहे। यही कामना है जीवन की। पुरस्‍कार चाहे न मिले, नकद राशि बिल्‍कुल भी न मिले, पर बचपन और पर्यावरण का तारतम्‍य अपनी स्निगधता में बना रहे, यही मेरी और प्रत्‍येक नेक सच्‍चे मानव मन की कामना है। 

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बचपन और पर्यावरण-- मोनिका जैन

>> रविवार, 24 अप्रैल 2011

My Name is monika jain.i compleated M.B.A. & pesetaly i am working
 at air raipur as a compear . my father'name is Mr.Pradeep kumar jain.
He is a doctor. Basially i am from simga dist.-raipur.
                                   My dream to make my india greean &
 clean.this lekh is only starting to send my thoughs to persons . Who
understand the actual meaning of environment.we thankfull to you bcoz
giving me this opportunity.


बचपन और पर्यावरण

प्रस्तावना’:- हंसता, मुस्कुराता, खिलखिलाता बचपन देखकर मन आनंदित हो उठा पर पर्यावरण की स्थिति देख । इस बचपन के भविष्य हेतु मन चिंतित हो उठा !पूरा विष्व आज पर्यावरण प्रदूषण ग्लोबल, वर्मिग जैसी बड़ी - बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है ।

ये समस्यायें जहॉ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है वहीं सुरसा की तरह मुंह फाड़े हमारे पर्यावरण और विकास को निगलती जा रही है । हम मनुष्य है ईष्वर तो नही जो इस विराट मुख से आसानी से निकल आयें और हमें नुकसान भी ना हो ।आज पृथ्वी प्रदूषित होती नजर आती है जिस तरफ देखो वायु, मृदा ,जल, सभी में
विषैले पन का अनुभव होता है ।

हमने अपने विकास और सुविधाओं को इस प्रकार विकसित किया कि हमारे पर्यावरणका हर कोना प्रदूषित हो चुका है । हम जानते है किन्तु हमेषा अंजान बनकर बार -बार वही करते है जो नहीं करना चाहिए । इस जाने अंजाने कार्यो से हमारी प्रकृति और पर्यावरण को केवल नुकसान ही होता आया है ।

कार्य किया विकास के लिए पर हमने अपनी सुख सुविधायों के लिए अपने पर्यावरण को क्षति पहुंचायी हमने अपना आज तो गुजार लिया किंतु आने वाले कलपर प्रष्न चिन्ह अंकित कर दिया । इस प्रष्न का उत्तर भी हमारे पास ही है । किन्तु उस उत्तर के लिए अभी से ही प्रयास करना होगा ।

बच्चों को अभी से ही पर्यावरण का महत्व समझाना होगा । पेड़ पौधे लगाओ से कहे बिना उन्हें पेड़ लगाकर बताना होगा ।
पर्यावरण को नुकसान क्यों और कैसे ?

कहने के लिए बहुत ही तुच्छ सा प्रष्न है किन्तु इस छोटे से सवाल पर बड़े बड़े बवाल
है ।

ये तो अब आम बात हो गयी है । छोटे से छोटे बच्चे तक अब बता देते है कि
पर्यावरण को नुकसान क्यों हो रहा है ? और कैसे हो रहा है और पर्यावरण
प्रदूषण के कारण हम कैसे प्रभावित हो रहे है एक छोटे से बच्चे में इतनी समझ
पर क्या फायदा उस समझ का प्रयोग प्रायोगिक तौर पर कहॉ हो पाता है । इसलिए
पहले प्रयोग फिर पढ़ाई में हो उपयोग वाली विधि का चयन करें ।

हमारे द्वारा रखी गयी असावधानियॉ ही कारण है पर्यावरण के नुकसान का ।

‘‘ चिड़िया चुग गई खेत अब पछतावा क्यों ?’’

ये पक्तियॉ भले ही किसी सज्जन ने हंसी में कह दिया होगा पर पर्यावरण की बात पर
सटीक है । सबसे पहले कुछ घटनाओं पर विचार करिये ।

(1) मुंबई के समुद्री किनारे पर तेल का भारी मात्रा में बहना ।

(2) जयपुर में पेट्रोल पंपों में लगी आग ।

(3) रेडियेषन के कारण रद्दी के दुकानों पर हुआ नुकसान

(4) भोपाल गैस कांड आदि ।

(5) भोपाल गैस कांड आदि ।

(6) प्रदूषण के कारण केवल फैक्ट्री या कारखानें ही नही है । हमारी
असावधानियॉ है ।

भले ही ये घटनायें अचानक घटित हुई । पर हुई तो हमारे ही कारण हमें पता
है कि पालीथिनों के प्रयोग पर रोक है फिर भी धड़ल्ले से हर कोई करता इनका
प्रयोग है ।

प्रयोग के बाद गंदगी फैलती है सो अलग । ये तो कुछ ही गलतीयों का भयावाह रूप
है । अगर गिनने बैठ जायें तो पृथ्वी के निर्माण के बाद हमारे किवास के प्रारंभ
से अब तक की दुर्घनाओं पर तो पूरी लाइब्रेरी ही बन जायेगी ।

(3) पहले और अब:- पहले भले ही हम कम विकसित ये किन्तु ये तो समझते कि यदि
पेड़ काटा है तो पौधा लगाना ही है ।

और अब पौधा लगायें ना लगायें पेड़ की कटाई जरूरी है ।

(4) एक छोट सी कहानी:- हम छोटे ये तब एक गांव गये वहॉ जाकर वो फल और
सब्जियों का आनंद उठाया जो अब केवल कल की बातें हो चुकी है ।

फिर घुमते - घुमते पता चला कि पहले जो भी सजा देनी होती तो पंच सरपंच
लोगों को पेड़ लगानें और उस पेड़ पौधों की देखभाल करने की सजा देते
थें । छोटी सजा कम पौधे लगाने की और बड़ी सजा ज्यादा पौधे लगाने की
होती थी ।

जानकर अच्छा लगा तब ये जब भी गलती होती एक छोटा सा पौधा लगानें की पहल की
पर बड़े होते - होते ये बातें पीछे छूट गयी । जो गलत हुआ पर कहीं कहीं
हमारी दी हुई षिक्षा काम आ गई ।

आज जब हमारे यहॉ बच्चे गलती करते है । या फिर जन्म दिवस आदि पर एक छोटा सा
पौधा लगवाकर हम खुष होते है । फिर ये विचार आता है कि केवल एक के प्रयास
से क्या होगा ।

हमारे यहॉ ही नही पूरे विष्व को इस कार्य को युद्व स्तर पर अपनाना होगा ।

(5) बचपन से करें षुरूवात:- छोटे - छोटे हाथों में बड़ी जिम्मेदारी न
थमाते हुए । उन्हें प्रयोग करके बताये पहले हर घर में बड़े - बड़े बाग बगीचे
हुआ करते थें और अब सारा गार्डन घर के अंदर रखे गमलों में आ गया है ।

(क) इसलिए प्रयत्न ये करें कि हर स्कूल हर घर में छोटे - छोटे बगीचे हो जहॉ
बच्चे पौधे लगायें और उनकी देखभाल बच्चों को सिखायें और खेत -
खलिहानों जंगलों या पौधों से संबंधित एक अलग विषय स्कूलों में पढ़ाये
जायें ।

(ख) स्कूलों में या घरों में जिस तरह से इंजिनियर, डॉक्टर, एम.बी.ए.,
कम्प्यूटर के क्षेत्र में पढ़ाई कराई जाती है । उसी प्रकार पौधो के अलावा खेती
- किसानी जैसे विषयों को भी षुरू से ही रखा जाये ।

(ग) पर उपदेष कुषल बहुतेरे इस प्रथा को हटाकर स्वयं से षुरूवात करते हुए ही
षिक्षा दें । अन्यथा बच्चों को सही मार्गदर्षन नहीं दिया जा सकता । इसलिए पहले
खुद की आदतें जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हों उन्हें बदलने का प्रयत्न
करें ।

(घ) पर्यावरण और प्रकृति की सुरक्षा की षुरूवात तो कभी भी की जा सकती है पर
ज्यादा देर करने पर नुकसान और बढ़ सकता है । इसलिए समय रहते कुछ ऐसे नियम
बनाये और अनुषासन पूर्वक उन नियमों का पालन किया जायें ।

(ज) जन्म दिन, त्यौहारों पर बच्चों से एक पौधा जरूर लगवायें ।

वैसे बचपन के लिए तो बहुत षुरूवात है किन्तु पर्यावरण की सुरक्षा में बड़ों को
भी बड़चढ़ कर उत्साह दिखाना चाहिए ।

फल, फूल, सब्जीयों के अलावा पौधो और पेड़ो के महत्व को समझना और बच्चों
को समझाना होगा ताकि बचपन खुषबु, स्वाद व सेहत से जुड़ा रहे ।

निष्कर्ष:- आंचल के तुझे मै ले के चलू कुद याद आया । किषोर कुमार की सुरीली
आवाज और गीत के बोल जिसे हमें भविष्य में यथार्थ में बदलना होगा । ताकि
भविष्य में किसी का बचपन पर्यावरण की दी हुई सौगातो से अछूता ना रहे ।

विकास और प्रकृति एक साथ कदमों से कदम मिलाकर चले । प्रकृति - पर्यावरण इन
षब्दों के महत्व को समझना और समझाना होगा । ताकि भविष्य अंधकारमय होने
से बचा रहे ।

आज धीरे - धीरे स्थिति इतना विकराल रूप धारण कर चुकी है कि हम थोड़े से
असावधान हुऐ नही और बड़ी - बड़ी घटनायें घटित हो जाती है ।

(1) पर्यावरण ही प्रदूषित:- (क) सच पहले और अब में कितना अंतर है आज हर
मनुष्य पर्यावरण से जुड़ी हुई अपनी जिम्मेदारियों से विमुख है उसे फिक्र है
तो केवल अपनी सुविधाओं की ।

(ख) सुविधाओं का दायरा भी इतना बड़ा कि हर पल कोई ना कोई नया अविष्कार
हो रहा है फिर अविष्कार चाहे महामषीन का हो या फिर छोटी मषीन का सारे
प्रयोग होते तो प्थ्वी के लिए पर्यावरण को नुकसान ही पहुंचाते है ।

(ग) आज हर मौसम में एक नयी बीमारी और उस बीमारी के चक्रव्यूह में फंसते मनुष्य
कभी इसका कारण प्रकृति का कहर तो कभी मनुष्य के अनदेखे प्रयोग नुकसान तो
पर्यावरण का ही हुआ ना ।

(घ) विकास उचित, प्रयोग उचित किन्तु इनका दुरूपयोग अनुचित जिसके प्रति जागरूक ना
होकर हम पर्यावरण को लगाातार नुकसान पहुंचा रहे है ।

(2) पर्यावरण बचाव के उपाय:-

पौधे लगाओ, जनसंख्या वुद्वि रोको, ये सब बातें तो बहुत हुई । अब प्रायोगिक
तौर पर इन बातों को अपनाना होगा । और इसक षुरूवात होगी बचपन से ।

(3) बचपन से षुरूवात:-(क) स्कूलों, कालेजों में पर्यावरण और पर्यावरण से
संबंधित विषयों को पढ़ाने के अलावा प्रयोगिक तौर पर बताने का प्रयत्न किया
जाये ।

(ख) पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसे नियम बनायें जायें जिससे पर्यावरण
को सुरक्षित रखा जा सके और अनुषासन पूर्वक नियमों का पालन किया जायें ।

(ग) बच्चों को जन्म दिन, त्यौहार आदि पर एक पौधा जरूर लगवायें ।

(घ) गलती करने पर ही पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने की सजा दें । जिसमें
बड़े भी उनकी मदद करें ।

(ज) कृषि, बनों से संबंधित कुछ ऐसे विषेष विषय हों जो भविष्य में
अपनाकर बच्चे अपना कैरियर बना सके तकनीक ही नहीं प्रकृति के रूपों को भी पहनाने
।

ये तो कुछ उपाय है जिसके द्वारा बचपन में ही पर्यावरण के महत्व और उसके फायदें
जानें जा सकते है ।

किंतु पर्यावरण की सुरक्षा पर और गहराई से विचार कर उपायों का प्रयोग कर
पर्यावरण को बचाया जा सकता है । फिर चाहे बात सावधानी की हो, अपने विकास की
या फिर पर्यावरण सुरक्षा की ।

अभी नही तो फिर षायद कभी नही । अभी से पस्थितियों को सुधारने की पहल न
की जाये तो बाद में बचपन पर्यावरण से दूर हो जायेगा ।

ये बाते षायद हम कहीं न कहीं से समझनें लगे है । और षुरूवात हो चुकी है ।
समय रहते ही समझ लेना बेहतर होगा । ताकि आज और आने वाले कल का बचपन
पर्यावरण की देन से महरूम ना रह जाये ।

हमारे बचपन में मिली हुई सौगातें हम उन्हें भी दे पायें और जैसा मैने लिखा
उन्हें एक ऐसा गगन एक ऐसी छांव मिले जहॉ प्रदूषण जैसे गम उन्हें छू भी ना
सकें ।

तो आइये हम सब मिलकर पर्यावरण और बचपन को संवारने का मिलकर पर्यावरण और
बचपन को संवारने का मिलकर आगाज करें ।

नये दिन नई षुरूवात, नये सूरज नयी रौषन की स्वागत करें । जिसमें प्रदूषण
रहित पर्यावरण हो और हर बचपन षुद्व स्वाद, हवा, पानी, का हकदार है जो उसे
मिलना ही चाहिए ।

क्योंकि पर्यावरण से हम और हम से पर्यावरण आपस में इस प्रकार जुड़े है किसी
को भी नुकसान होना मतलब दूसरे को उससे बड़ा नुकसान ।

उसी प्रकार बचपन भी पर्यावरण से जुड़ा हुआ है । और इसे बचाने की चहल भी
बचपन से ही होना चाहिए ।

 मोनिका जैन
प्रदीप कुमार जैन
जैन मेडिकल स्टोर सिमगा

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बचपन और पर्यावरण.---कविता वर्मा

>> शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

परिचय-कविता वर्मा,
पढ़ने की अभिरुचि ब्लॉगजगत तक खींच लाई,इसके विराट स्वरुप ने लेखन की चाह  को विस्तार दिया,और जिस उन्मुक्त ह्रदय से इसने मुझे अपनाया ,सराहा ,में अभिभूत हुई.नाम है कविता वर्मा ,मन की बाते विचार उलझने जो किसी से न कह पाई वही शब्दों के रूप में निकल कर "कासे कहूँ "में समां गयी ....ब्लॉग ने कुछ न कह पाने की पीड़ा को बखूबी सहलाया ,और मन की कही अनकही बाते यहाँ उंडेल कर में भारहीन हो कर उन्मुक्त आकाश में उड़ चली... 



 क्या खेले ?क्या खेले?सोचते सोचते आखिर ये तय हुआ नदी पहाड़ ही खेलते है।
तेरी नदी में कपडे धोउं,
तेरी नदी में  रोटी पकाऊ,
चिल्लाते हुए बच्चे निचली जगह  को नदी और  ऊँचे ओटलो को पहाड़ समझ कर  खेल  रहे है ,नदी का  मालिक अपनी नदी  के लिए  इतना सजग है की उसमे कपडे धोने ,बर्तन  धोने से  उसे तकलीफ होती  है। 
गर्मियों की  चांदनी रात ,लाइट नहीं है अब अँधेरे  में क्या करे? एक जगह बैठे तो मच्छर काटते है ,नानी कहती  है ,
अरे ! जाओ धुप छाँव खेलो ,कितनी अच्छी चांदनी रात है,और बच्चे मेरी धूप और मेरी छाँव के मालिक बन जाते है।   
 इत्ता इत्ता पानी गोल गोल रानी हो या अमराई में पत्थर पर गिरी केरीयों की चटनी पीसना ,खेलते हुए किसी कुए, की जगत पर बैठना, प्यास लगे और पानी न हो तो किस पेड़ की पत्तियां चबा लेना ,या रंभाती गाय भैस से बाते करना,इस साल किस आम पर मोर आएगा किस पर नहीं ,गर्मी में नदी सूखेगी या नहीं, टिटहरी जमीन पर अंडे देगी या नहीं ?हमारा बचपन तो ऐसी ही जाने कितनी बातों से भरा पड़ा था। खेल खेल में बच्चे अपने परिवेश से कितने जुड़ जाते थे?कितनी ही बाते खुद -ब -खुद सीख जाते थे ,पता ही नहीं चलता था। हमारे खेल हमारे जीवन से परिवेश से पर्यावरण से इस तरह जुड़े थे की उन्हें कही अलग देखा ही नहीं जा सकता था।
समय बदला नदियाँ सूख गयी, पहाड़ कट कर सड़के या खदाने बन गयी,सड़क की लाइट ने चाँद तारों की रोशनी छीन ली,अब न पेड़ों से मोह रहा न उनकी चिंता, पानी के लिए ट्यूब वेल आ गए या मीलों दूर से पाइप  लाइन ।       

 हमारा प्लेनेट खतरे में है ,अन्तरिक्ष से आयी आफत हम पर टूट पड़ी ,
पोपकोर्न खाते हाथ मुह तक आने से पहले ही रुक गए ,अब आयेंगे हमारे सुपर हीरो .........
ये लो आ गए पृथ्वी,अग्नि, वायु, जल ,आकाश और ये बनी सुपर पॉवर मिस्टर प्लेनेट ,और दुश्मन का हो गया खात्मा ,हमारी पृथ्वी बच गयी ।
एक गहरी सांस लेकर पोपकोर्न खाना फिर शुरू हो गया ,बिस्तेर पर पैर और फ़ैल गए । लीजिये अब चाहे अन्तरिक्ष से कोई आफत आये या ओजोन लयेर में छेद हो ,चाहे कही आग लगे या बाढ़ आ जाये हमारा सुपर हीरो सब ठीक कर देगा ,हम खाते रहेंगे आराम से अपने घर में बिस्तर पर । न्यूज़ पेपर वाले शोर मचाएंगे,टीचेर कोई प्रोजेक्ट देगी ग्लोबल वार्मिंग पर हम नेट से जानकारी जुटा कर ढेर सारे कागजों को इस्तेमाल करके बढ़िया सा प्रोजेक्ट बनायेंगे और १० में से १० नंबर पायेंगे । अब जिस पर्यावरण को कभी महसूस ही नहीं किया जिस की गोद में खेले ही नहीं उसके लिए संवेदनाये लाये कहाँ से ?
    बच्चे पर्यावरण से बस इसी तरह से जुड़े है अब इसमें उनका क्या दोष है ?
जो पर्यावरण हमारे बुजुर्गों ने हमारे लिए सदियों से सहेज कर रखा था ,उसे हमने अपने स्वार्थ के लिए किस तरह तहस नहस कर दिया है,और इसी के साथ छेन लिया है पर्यावरण सा मासूम बचपन .....

पर्यावरण सहेजे ,ताकि बचपन का भोलापण कायम रह पाए...

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बचपन और हमारा पर्यावरण---डा श्याम गुप्त

>> शनिवार, 9 अप्रैल 2011

                                                           -- परिचय--
नाम-- ---डा श्याम गुप्त       जन्म---१० नवम्बर, १९४४ ई.  
पिता—स्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, .
    जन्म स्थान—मिढाकुर, जि. आगरा, उ.प्र. .भारत   शिक्षा—एम.बी.,बी.एस., एम.एस.(शल्य)
    व्यवसाय-चिकित्सक,(शल्य)-उ.रे.चिकित्सालय ,लखनऊ से व.चि. अधीक्षक पद से सेवा निवृत ।
 साहित्यिक गतिविधियां-विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध, काव्य की सभी विधाओं—गीत, अगीत, गद्य निबंध, कथा, आलेख , समीक्षा आदि में लेखन। इन्टर्नेट पत्रिकाओं में लेख।  
     प्रकाशित कृतियाँ  -- १. काव्य दूत, २. काव्य निर्झरिणी ३. काव्य मुक्तामृत (काव्य सन्ग्रह) ,
      ४. सृष्टि –अगीत विधा महाकाव्य  ५.प्रेम काव्य-गीति विधा महाकाव्य ६. शूर्पणखा महाकाव्य ।
मेरे ब्लोग्स( इन्टर्नेट-चिट्ठे)—http://shyamthot.blogspot.com ,  sahityshyam , vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com   
सम्मान आदि—नराकास , राजभाषा विभाग,(उ प्र) द्वारा राज भाषा सम्मान, २००४, २००५.;
  अभियान जबलपुर संस्था द्वारा हिन्दी भूषण सम्मान, विन्ध्य.हिन्दी विकास संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बावा दीप सिन्घ स्म्रति सम्मान, अ.भा.अगीत परिषद द्वारा-श्री कमलापति मिस्र सम्मान, अ.भा. साहित्यकार दिवस पर प.सोहन लाल द्विवेदी सम्मान, अगीत विधा महाकाव्य सम्मान, जाग्रति प्रकाशन मुम्बई द्वारा-पूर्व पश्चिम गौरव सम्मान, इन्द्रधनुष सन्स्था बिज़नौर द्वारा-काव्य मर्मग्य सम्मान, छ्त्तीस गढ शिक्षक संघ द्वारा-हिरदे कविरत्न सम्मान, युवाओं की सन्स्था; ’सृजन’ द्वारा महाकवि सम्मान ।
 पता—  डा श्याम गुप्त,  सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना ,लखनऊ-( उ.प्र. भारत ) २२६०१२ .
          मो. ०९४१५१५६४६४ -----------------------------------------------------------------------------------
बचपन और हमारा पर्यावरण
        बचपन और पर्यावरण में क्या संबंध है ? सम्बन्ध है, गहन सम्बन्ध है, अन्तः सम्बन्ध है। बचपन मानव जाति, मानवता अपितु समस्त प्राणि-जगत का भविष्य है और सुन्दर, स्वस्थ्य,व अनुकूल पर्यावरण उस भविष्य, भावी पीढी को विकसित, पल्लवित, पुष्पित व फ़लित होने देने के लिये आवश्यक वातावरण, पृष्ठ भूमि व भाव-भूमि है।
        अतः पर्यावरण का प्रदूषण समस्त प्राणिजगत के वर्तमान, भविष्य व अस्तित्व के लिये महान संकट का कारक है। पर्यावरण प्रदूषण केवल जल, थल, वायु प्रदूषण द्वारा प्राणी जीवन के शारीरिक दौर्वल्य व क्षमता में कमी ही नहीं करता अपितु वह मानसिक, चारित्रिक व सामाजिक प्रदूषण का भी कारण बनकर-भ्रष्टाचार,चरित्र-हीनता, आचरणगत दौर्वल्य व वन्शानुगत दुर्बलता का भी कारक बनता है। पर्यावरण मानव ही प्रदूषित करता है और मानव पर ही उसके दुष्प्रभाव होते हैं जो मूलतः आगे आने वाली पीढी भुगतती है। अतः यदि मानवता के भविष्य—संतति को बचपन से ही स्वस्थ्य व सुन्दर, अनुकूल पर्यावरण प्राप्त नहीं होगा तो मानवता व समस्त प्राणि जगत का ही भविष्य अन्धकारमय रहेगा।
       सामाजिक प्राणी होने के कारण जहां भी जब भी मानव, सामाजिकता व प्राकृतिक अनुशासनों के विरुद्ध कार्य व आचरण करता है तो पर्यावरण सहित प्रत्येक प्रकार के वातावरण को दूषित करता है। अतः जहां हमें स्वयं अपने आचरणों से पर्यावरण पर ध्यान देना होगा वहीं बचपन से ही भावी पीढी व बच्चे यदि अनुशासित नहीं होंगे तो वे पुनः पुनः समाज व पर्यावरण को प्रदूषित करते रहेंगे। अतः बचपन से ही पर्यावरण संबर्धन, समाज, भौतिकता, साहित्यिकता, नैतिकता, संस्कृति-रक्षण के संस्कार बच्चों में डालने चाहिये, ताकि वे अच्छे नागरिक बनकर पर्यावरण को संतुलित रखें।
       आज केवल वातावरणीय पर्यावरण-जल, थल, वायु-ही प्रदूषित नहीं है अपितु मानसिक, सामाजिक, प्रदूषण से भी धरती ग्रसित है। अतितीब्र गति से अनियमित विकास, संसाधनों का अति-दोहन-वृक्षों ,जन्गलों की अन्धाधुन्ध कटाई, अति-भौतिकतायुक्त सुख-सुविधायुक्त जीवनचर्या के कारण हम पृथ्वी के वातावरण को प्रदूषित करते जारहे हैं। ग्लोबल वार्मिन्ग, ग्लेशियरों का कम होना आदि इसी के परिणाम हैं।
      आज बच्चों के खेलने के लिये उपयुक्त पार्कों ,मैदानों को बहुमन्जिली इमारतों में बदला जारहा है, जहां दिखाने भर को कुछ थोडा सा स्थान बच्चों के पार्क
आदि के नाम पर रखदिया जाता है। घर घर में खुलते हुए स्कूल-कालेज-संस्थानों में खेलने-कूदने, स्वास्थ्य प्रदायक स्थान होते ही कब हैं। सडकों पर बच्चों को मास्क
२.
लगाकर जाते हुए देखा जा सकता है, विभिन्न श्वांस के रोग व अन्य रोगों दमा, सांस फ़ूलना, एलर्जी, जैसी बीमारियों का बच्चों में बढना प्रदूषण के कारण ही है। स्कूल कालेजों के बच्चों का अपराधों में लिप्त होना, गोली चलाना, लूट-अपहरण आदि में शामिल होना आदि सर्वांगीण प्रदूषण का ही परिणाम है। तेज आवाज के शोर-गानों आदि द्वारा ध्वनि प्रदूषण से बच्चों की श्रवण क्षमता घट रही है। प्रदूषित व मिलावटी खाद्य सामग्री से बच्चों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर प्रभाव पड रहा है।
       बचपन और पर्यावरण के अन्तःसम्बन्ध का ज्ञान भारतीय मनीषा व पुरा वैदिक विज्ञान को युगों पहले ही था। अथर्ववेद- ४/७ में ऋषि  कहता है—
     “ यदस्या कश्मैचिद् भोगाय् बलात् कश्मिद्द प्रक्रतान्ते ।
       ततं क्रिस्तेण् म्रियन्ते वत्सोश्च् धानुकोः ब्रकः      ॥
अर्थात् जो (व्यक्ति,समाज़्,शासन्) केवल भोग्-विलास् व लिप्सावश् प्रकृति का कर्तन्, दोहन् करते हैं, उनकी सन्तानें, पशु-पक्षी मृत्यु को प्राप्त् होते हैं। व्यक्ति समाज़् व राष्ट्र का नैतिक् कर्तव्य् निर्धारित् करते हुए अथर्व् वेद् कहता है—
   “  यदस्य् गोपदो सत्यालोप् अज़ोहितः ।
     तत्कुमारा म्रियन्ते ,यक्ष्मो विन्दत् नाशयात् ॥ “
अर्थात् जिस् ग्रह् ,नगर्, ग्राम्,समाज्, राष्ट्र में पर्यावरण् नष्ट् होता है वहां सन्तति ( ज़ैविक् धन्-पशु,पक्षी, मानव्-सन्तान् ) को यक्ष्मा (विभिन्न रोग् व विकार ) जकड कर् हानि पहुंचाते हैं। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद -४/१८ में  कहा है-
    “अयं पन्था अनुबित्तः पुराणो मतां देवां उपजायंत् विश्वे ।
    अतश्चिदा जनयीष्ट् प्रबुद्दो मा मातरममुया पन्तवेः कः  ॥ “
अर्थात् यह् पन्थ् सनातन् है ( सदैव सुनिश्चित् तथ्य ) कि प्रबुद्द लोग् अपनी आधार भूता माता (प्रकृति  व पर्यावरण्) को विनष्ट् न करें, यह् उनका प्रथम् कर्तव्य् है।
       इस प्रकार कहा जासकता है कि निश्चय ही पर्यावरण का बचपन से सीधा सम्बन्ध है, और यदि बचपन को स्वस्थ्य, सुखद, अनुकूल, अप्रदूषित पर्यावरण नहीं मिलता तो प्राणी जगत का भविष्य अन्धकारमय होना निश्चित है। हमें मनसा, वाचा, कर्मणा पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सजग होजाना चाहिये, बच्चों को भी यह ज्ञान प्राप्त कराना चाहिये, ताकि संस्कृति, परम्परा ,प्रगति, विकास व आधुनिकता के समन्वित भाव से हर प्रकार का प्रदूषण समाप्त हो; और इन सबके समायोजन व समन्वय को लेकर चलने वाला भारतीय विश्वबंधुत्व-भाव, साहित्य, शास्त्र-परम्परा व वैदिक-विज्ञान के मार्ग पर चलकर ही बचपन व संपूर्ण मानवता के कल्याण का यह मार्ग प्रशस्त होगा, जो आज के भौतिकवादी युग की अनन्यतम आवश्यकता है ।

     रचनाकार ----डा श्याम गुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ(उप्र)-२२६०१२ --मो. ०९४१५१५६४६४.

           

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बचपन और हमारा पर्यावरण -- जयदीप शेखर

>> गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

लेखक परिचय
नाम- जयदीप दास. कलमी नाम- जयदीप शेखर.
       भूतपूर्व वायुसैनिक, वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में सहायक.
मेरे ब्लॉग- नाज़-ए-हिन्द सुभाष, कभी-कभार, विन्दुधाम बरहरवा, खुशहाल भारत, कारवाँ और आमि यायावर.  
       पिता का नाम- डॉ. जे.सी. दास
       स्थायी निवास- विन्दुधाम पथ, बरहरवा- 816101, जिला- साहेबगंज, झारखण्ड.  
वर्तमान पता- भा.स्टेट बैंक, कृषि बाजार प्राँगण शाखा (6427), अररिया कोर्ट- 854311 (बिहार)
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बचपन और हमारा पर्यावरण

विषय प्रवेश
थोड़ी देर के लिए हम अपने-आप को ब्रह्माण्ड के बाहर रखकर देखते हैं। क्या पाते हैं- अरबों-खरबों प्रकाश वर्ष दूर तक विभिन्न आकार-प्रकार के आकाशीय पिण्ड फैले हुए हैं और विभिन्न कांतियों में चमक रहे हैं। मगर इनमें से किसी पर भी 'जीवन' नहीं है। 'जीवन' की लौ अगर कहीं है, तो वह है- ब्रह्माण्ड के एक कोने में स्थित नीहारिका 'आकाशगंगा' के एक छोटे-से सौर-मण्डल के एक नन्हे-से नीले रंग के ग्रह पर, जिसका नाम है- पृथ्वी! ओह, इतना विशाल ब्रह्माण्ड और मात्र एक छोटे-से ग्रह पर जीवन! अगर यहाँ भी 'जीवन' नष्ट हो गया तो? सोचकर ही सिहरन पैदा होती है। अर्थात् यहाँ 'जीवन' को बचाये रखना जरूरी है। इसके लिए क्या करना होगा? पृथ्वी के 'पर्यावरण' को कायम रखना होगा, क्योंकि इसके खास 'पर्यावरण' के कारण ही यहाँ जीवन कायम है। इस पर्यावरण को कौन बचायेगा? बेशक, इस ग्रह पर रहने वाला प्रकृति का सबसे बुद्धिमान जीव- मनुष्य!
क्या वाकई 'जीवन' को खतरा है?
जी हाँ, वाकई पृथ्वी पर 'जीवन' को खतरा है। हमारी आने वाली नस्लों के बच्चों के लिए साँस लेना भी दूभर होने वाला है। पृथ्वी की हवा, इसकी मिट्टी, इसका पानी, यहाँ तक कि इसका 'अन्तरिक्ष' भी प्रदूषित हो चुका है। 'ओजोन' रक्षा-कवच में छेद हो रहे हैं। ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघल रही है। या तो सूर्य की पराबैंगनी किरणें सबकुछ जलाकर खाक कर देंगी, या फिर, सबकुछ जलमग्न हो जायेगा। 
क्या है कारण
धरती पर बढ़ती जनसंख्या तथा 'उपभोगवादी' जीवन शैली इसके कारण हैं। इन दोनों बातों के चलते जंगल उजाड़े जा रहे हैं; खेतों में, हवा में और नदियों में जहर घोले जा रहे हैं, और 'ई-कचरों' तथा परमाण्विक कचरों का जखीरा बढ़ाया जा रहा है। हमारी स्थिति उन चिड़ियों-जैसी हो गयी है, जो रटती थीं- 'शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फँसना मत'- और जाल में फँसती जाती थीं। यानि, हम और हमारी सरकारें अच्छी तरह जानती हैं कि पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाकर हम न केवल आनेवाली पीढ़ियों का जीना मुश्किल कर रहे हैं, बल्कि धरती पर 'जीवन' को ही खतरा पहुँचा रहे हैं; फिर भी हम पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाने के नये-नये तरीके ईजाद करते जा रहे हैं। 
क्या हैं उपाय
आँकड़ों और तकनीकी जानकारियों की गहराई में न जाकर हम सीधे इस पर विचार करते हैं कि वे कौन-से उपाय हैं, जिनपर अमल करके हम अपने पर्यावरण को 'प्राकृतिक' बना सकते हैं। वे उपाय हो सकते हैं-
1.       जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण। जिन भौगोलिक क्षेत्रों तथा सामाजिक तबकों में जनसंख्या वृद्धि की दर ज्यादा है, उनकी युवा महिलाओं के लिए खास नौकरियाँ तैयार की जायं और उन्हें इनमें इस शर्त के साथ शामिल किया जाय कि वे अट्ठाईस वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनेंगी। इसी प्रकार, अट्ठाईस वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनने वाली सभी महिलाओं को नकद पुरस्कार भी दिया जाय।
2.       उपभोगवादी संस्कृति पर रोक। जीवन-शैली को शान्त-चित्त तथा 'उपयोग'-वादी बनाया जाय। छह घण्टों से अधिक किसी को भी काम करने की अनुमति न हो। समय कम जान पड़े, तो दो या तीन शिफ्टों में काम किया जाय। इसके लिए वेतन-भत्तों में कमी लाते हुए ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को रोजगार दिया जाय। दूसरी तरफ, लोगों को सामाजिक-सांस्कृतिक-साहसिक कार्यों/अभियानों में भाग लेने के प्रेरित किया जाय। इसके लिए 'बुद्धू बक्से' का प्रसारण दिन में सिर्फ पाँच घण्टों के लिए सीमित करना पड़े, तो वह भी किया जाय।
3.       'मकड़जाल साइकिल ट्रैकों' का निर्माण। जो शहर प्रदूषित घोषित किये जा चुके हैं, वहाँ मोटर गाड़ियों का पंजीकरण एवं स्थानान्तरण बन्द कर दिया जाय और इसके बदले में 'फ्लाय ओवर' साइकिल ट्रैकों का निर्माण किया जाय। इन साइकिल ट्रैकों की संरचना मकड़ी के जाले पर आधारित होगी और यहाँ सभी प्रकार की साइकिलें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहेंगी। इस ट्रैक के उपयोग के लिए मामूली दर पर टिकट लगायी जाय और एक टिकट दिन भर के लिए वैध हो।
4.       जैविक खाद तथा कीट नियंत्रण प्रणाली। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उत्पादन एवं उपयोग तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाय और इसके स्थान पर जैविक खादों तथा 'कीट नियंत्रण प्रणालियों' का तेजी से विकास किया जाय।
5.       बेकार/बंजर जमीन में खेती। खेती का रकबा बढ़ाने के लिए जंगलों को काटने की जरूरत नहीं है। सरकारी विभागों के पास हजारों एकड़ जमीन बेकार पड़ी रहती है। इन जमीनों पर- यहाँ तक कि हवाई अड्डों की खाली जमीन पर भी- जरूरी एहतियात के साथ खेती या बागवानी करवायी जा सकती है। जब हम कहते हैं कि विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है, तो क्या बंजर जमीनों को भी खेती योग्य नहीं बनाया जा सकता?
6.       हरित पट्टियाँ। हर गाँव, कस्बे, नगर, महानगर के चारों तरफ विभिन्न चौड़ाईयों वाली हरित पट्टियों का निर्माण किया जाय। इनमें स्थानीय किस्म के फल-फूल-छायादार पेड़ लगाये जायं।
7.       'जंगल कॉरिडोर'। बड़े जंगलों को 'जंगल कॉरिडोरों' से आपस में जोड़ दिया जाय। इन कॉरिडोरों से होकर गुजरने वाली सड़कों को 'फ्लाय ओवर' तथा रेल ट्रैक को भूमिगत रुप दिया जाय।
8.       छोटे बिजलीघर। एक गहरा कुआँ (जो नहर द्वारा निकटतम नदी से भी जुड़ा हो), एक ऊँचा जलमिनार, एक कृत्रिम 'जलप्रपात', एक टर्बाईन तथा एक पावर हाऊस के सहारे एक, आधा या चौथाई मेगावाट पनबिजली पैदा करना कोई बड़ी बात नहीं है। यहाँ तक कि दो 'स्प्रिंगों' की मदद से एक भारी एवं विशाल पेण्डुलम को 'सदा गतिशील' बनाकर भी उसकी 'गतिज' ऊर्जा को  'विद्युत' ऊर्जा में बदला जा सकता है; या फिर, सीधे उस 'गतिज' ऊर्जा से मिलों/फैक्ट्रियों की गरारियों को घुमाया जा सकता है। इस प्रकार के छोटे-छोटे बिजलीघरों का जाल बिछा दिया जाय। इसके बदले ताप और परमाणु बिजलीघरों को बन्द कर दिया जाय।
9.       सौर ऊर्जा। एक तरफ तो सौर ऊर्जा को सस्ता बनाने की कोशिश की जाय, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग इसका उपयोग कर सके; दूसरी तरफ, सार्वजनिक स्थलों- जैसे, गली व राजपथ, रेल स्टेशन, बस अड्डा, हवाई अड्डा, इत्यादि- पर कम-से-कम दो तिहाई बल्ब और पंखे सौर ऊर्जा से चालित रखे जायं। अन्यान्य इमारतों/भवनों में भी इस अनुपात को अपनाया जा सकता है।
10.   प्रदूषित नदियों का बचाव। जो नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, उनके किनारे-किनारे दो भूमिगत पाईप लाईन बिछाये जायं- एक से होकर कल-कारखानों का कचरा बहेगा तथा दूसरे से नगरों का मल-जल। इस कचरे तथा मल-जल को समुद्र के किनारे स्थापित बड़े परिशोधन संयंत्रों तक लाया जाय और संशोधन के बाद जल को समुद्र में बहा दिया जाय। पाईप लाईन के बीच-बीच में जरूरत के मुताबिक 'पम्पिंग स्टेशनों' की भी व्यवस्था की जाय।
11.   नदियों का स्वाभाविक बहाव। नदियों पर बने बाँधों को तोड़ दिया जाय (पायों पर बने 'पुल' कायम रहें); 'गाद' की सफाई कर नदियों की गहराई बढ़ा दी जाय, और इस प्रकार नदियों को उनके स्वाभाविक रुप में बहने दिया जाय। अन्तर्देशीय 'नौ-परिवहन' को- खासकर माल-ढुलाई के लिए- बढ़ावा दिया जाय। 
12.   ए.सी. का विकल्प। सभी जानते हैं कि 'ओजोन परत' को नुक्सान पहुँचाने में जिन क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन गैसों का बड़ा हाथ है, वे एयर-कण्डीशनर से पैदा होती हैं। नगरों-महानगरों में गर्मी बढ़ाने में भी इन्हीं का हाथ होता है। अतः इन्हें हटाकर पुरानी परम्परा को फिर से अपनाया जाय। भवनों के बरामदों, दरवाजों-खिड़कियों पर 'खस' (या इस जैसी किसी और घास) के पर्दे लटकाये जायं और उन्हें भिंगोये रखने के लिए सामान्य 'यांत्रिक' व्यवस्था कर दी जाय।
13.   पॉलिथीन का विकल्प। जब तक प्रकृति में 'नष्ट' होने वाली पॉलिथीन का विकास नहीं हो जाता, तब तक के लिए पॉलिथीन के थैलियों पर शत-प्रतिशत प्रतिबन्ध लगा दिया और इसके विकल्प के तौर पर 'स्टॉकिनेट' (बनियान-जैसा जालीदार कपड़ा, जो काफी खिंच सकता है और जो मजबूत भी बहुत होता है) की थैलियों को बाजार में उतारा जाय।
14.   नाजुक पर्यावरण वाले क्षेत्र। जिन क्षेत्रों का पर्यावरण नाजुक है, वहाँ 'कंक्रीट' निर्माण तथा मोटर गाड़ियों का प्रवेश रोक दिया जाय। जहाँ तक सैलानियों एवं तीर्थयात्रियों की परेशानी का सवाल है; यह स्पष्ट कर दिया जाय- कि भ्रमण एवं तीर्थ यात्रा सिर्फ उनके लिए है, जो अपनी जरूरत का सामान खुद उठाने और मीलों पैदल चलने में सक्षम हैं- अन्यथा वे भ्रमण या तीर्थ का विचार दिमाग से निकाल दें!
उपसंहार
अगर हम उपर्युक्त चौदह सूत्रों को ईमानदारी और कठोरता पूर्वक लागू कर सकें, तो इसमें कोई शक नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के बच्चों को न केवल एक स्वस्थ पर्यावरण देकर जा सकते हैं, बल्कि इस अनन्त ब्रह्माण्ड में टिमटिमाती जीवन की इकलौती लौ को भी बचा सकते हैं। हालाँकि इन सूत्रों को लागू तो सरकार करेगी, पर अभियान चलाकर सरकार पर दवाब डालना हम नागरिकों का कर्तव्य है। 

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