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बचपन की रंगीन दुनिया चहकती--शालिनी कौशिक

>> सोमवार, 18 अप्रैल 2011

शालिनी कौशिक [एडवोकेट]
                         पुत्री श्री कौशल प्रसाद कौशिक एडवोकेट
                                 कांधला [मुज़फ्फरनगर]
जीवन के सबसे सुनहरे पल यदि कोई भी सोचे विचारे तो वे पल होते हैं जो हम बच्चे रहकर गुजारते   हैं अर्थात बचपन से प्यारा इस जग में कुछ नहीं.बचपन का यही आकर्षण कवियों,गीतकारों को भी लुभाता रहा है .बचपन में जो सोम्यता  सरलता है उसे ध्यान में रखते हुए ही हमारी फिल्मे भी बचपन की प्रशंसा करते नहीं थकती हैं:-
"औ औ औ बचपन के दिन भुला  न देना,
"बचपन हर गम से बेगाना होता है."
   प्रकृति और बचपन का साथ सदेव से रहा है और इसी कारण यही देखा जाता है कि लोग बच्चों को कभी फूल और कभी चाँद कहकर संबोधित करते हैं . पंडित जवाहर नेहरु जहाँ कहीं भी जाते थे बच्चों को देखकर आत्मविभोर हो जाते थे  और उन्हें बड़े प्रेम से माला व् गुलदस्ता देते ,पुचकारते और गोदी में उठाते ,यहाँ तक कि पंडित नेहरु ने तो अपने जन्म दिवस को ही ''बाल दिवस '' के रूप में परिवर्तित कर दिया था .वे कहते थे '' देश की असली निधि और वास्तविक समृधि तो देश के बच्चे हैं ,ये वे कली  हैं जो कल विकसित होकर अपने सौरभ से अपने मुल्क को तथा दुसरे मुल्कों को सौरभान्वित कर देंगे '' .
किन्तु आज अगर हम देंखे तो बचपन को जीवन देने वाली प्रकृति की धरोहर  का विलोपन हो रहा है .बचपन कम्प्यूटर रूम या छोटे -छोटे कमरों या छोटी छोटी गलियों में सिमट कर रह गया है .बचपन में हम जिन प्राकृतिक वादियों में घूम फिर कर जिस उल्लास का अनुभव करते थे उसका लेश मात्र भी अब दिखाई नहीं देता है .जनसँख्या दबाव व् औद्योगिकीकरण ने नगरीय सामाजिक पर्यावरण को काफी हद तक प्रदूषण युक्त कर दिया है .परिणामस्वरूप सामाजिक प्रदूषनो - गरीबी ,बेरोज़गारी,आतंकवाद, भ्रष्टाचार,आंतरिक सुरक्षा,स्त्री दमन,राजनीति का अपराधीकरन,जातिवाद,साम्प्रदायीकता ,एवं गड़बड़ चुनाव व्यवस्था का आधुनिक दशानन के रूप में अभ्युदय हुआ है और इस प्रदूषण का असर हम आज के बच्चों पर प्रत्यक्ष देखते हैं .
             बच्चों में आज वे भावनाएं जो पहले युवा वर्ग में आती थी बचपन में ही जन्म लेने लगी हैं.आज बच्चे कबीर की वे गीली मिटटी नहीं रहे जिन्हें कुम्हार किसी भी रूप में ढाल लेता है,अपितु आज बच्चों में वैज्ञानिक  प्रगति का प्रभाव कहें या यही पर्यावरणीय प्रदूषण ,ये सोच बचपन से दिखाई देती है.रोज़ समाचार-पत्र ऐसे समाचारों से भरे हैं जिनमे माँ-बाप की डांट पर बच्चा घर छोड़ गया या उसने आग लगा ली ,या गोली मार ली,  या माँ-बाप को ही मार दिया.
              छोटे-छोटे बच्चों में गर्ल-फ्रेंड ,बॉय-फ्रेंड परंपरा विकसित होती दिखाई पड़ रही है और यह वह प्रदूषण है जो हमारी कंप्यूटर -क्रांति के द्वारा बच्चों में फेला है.बच्चों के लिए कंप्यूटर-शिक्षा अनिवार्य की जा रही है और बच्चों का दिमाग इंटरनेट पर पोर्न वेबसाईट   तलाश रहा है माता-पिता की व्यस्तता बच्चों को और खुला वातावरण दे रही है और बच्चों का भोलापन छूमंतर होता जा रहा है .
           यदि हम इन सब बातों पर गौर करें तो पाएंगे कि इस सामाजिक दशानन का अंत श्रीराम सद्रश महिमान्वित समाज के विशुद्ध सांस्कृतिक पर्यावरणीय बाणों से ही किया जा सकता है  इसके लिए पहले समाज को परिवार को गरिमामय होना होगा .परिवार में एक दुसरे के प्रति बढ़ता वैरभाव  ,साजिशें ,बच्चों को गलत कार्य के लिए बड़ो द्वारा उकसाया जाना इसका प्रमुख  कारण है .ऐसे में भगवान राम के समान गरिमामय  जीवनशेली अपनाते हुए इन प्रदूषण रुपी राक्षसों को अपने गुण रुपी बाणों द्वारा मार गिराकर ही हम बच्चों को स्वच्छ सामाजिक पर्यावरण दे सकते हैं .यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम  बच्चों को फूलों से ही जुड़े रहने दें प्लास्टिक के भावनाविहीन खिलोने न बनने दें.शायर किंकर पाल सिंह के शब्दों में-
"बचपन की रंगीन दुनिया चहकती,चलो ढूंढ लायें.
बारिश का पानी व् कागज की कश्ती ,चलो ढूंढ लायें.
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परियों,पतंगों,तितलियों में उलझी कहानी में खोयी,
सपनीली भोली शरारत मचलती चलो ढूंढ लायें.

3 टिप्पणियाँ:

DR. ANWER JAMAL 18 अप्रैल 2011 को 9:02 am  

बचपन की रंगीन दुनिया चहकती,चलो ढूंढ लायें.
बारिश का पानी व् कागज की कश्ती ,चलो ढूंढ लायें.

Nice post.

आपकी पोस्ट की खबर 'ब्लॉग की ख़बरें' में पढी तो यहाँ आना हुआ .
अच्छा लगा .
मैंने खबर को आकर्षक बना दिया है .
कृपया आप भी पोस्ट के अनुरूप कोई चित्र लगा दिया करें
Blog Ki Khabren
पर
http://blogkikhabren.blogspot.com/

शिखा कौशिक 18 अप्रैल 2011 को 12:25 pm  

anvar jamal ji mehnat karne v yahan comment karne ke liye aabhar.mere pas post ke yogya koi chitr hoga to avashay lagaoongi.

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