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बचपन और हमारा पर्यावरण ---- सत्यम शिवम

>> मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

                               बचपन और हमारा पर्यावरण 
सच में बचपन बड़ा ही कोमल और सुकुमार पल होता है,जो हम सब की यादों में हमारे गुजरे सुहाने कल सा ही कही बसा होता है।बचपन की मस्ती,खेल कूद,ना चिंता खुद की और ना दुनिया की परवाह।बस इक लालसा बेबाक होकर इस उम्र को जीने की।
                      हमारा पर्यावरण जो हमारे आसपास की धरोवर है,जो है वृक्ष हमारे,हमारे खेत खलिहान जिसपर हमारे देश की आधारशीला रखी गयी है।पर्यावरण जीवन यापन हेतु इक ऐसा जीवंत पक्ष है,जिसके बिना खुशहाल जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
                          हमारा बचपन बहुत हद तक हमारे पर्यावरण से प्रभावित होता है।इक नन्हे दिल में इक छोटे पौधे को लगाने की चाहत ऐसी लगती है,मानों दोनों की मित्रता कई सदियों पुरानी हो।हम सभी विद्यालयों में अपने पाठ्यक्रम में भी एक ऐसे विषय का अध्ययन करते है,जो हमारे पर्यावरण से सम्बंधित होता है।बच्चों के बाल्य मन में पर्यावरण के प्रति जागृति पैदा करना ही इन विषयों का मुख्य उद्देश्य होता है।बहुत हद तक ये बच्चों को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराता है,जो उन्हे अपने पर्यावरण के प्रति सचेत करता है।बच्चे जानने लगते है इन हरी घासों के महत्व को जिन्हे वो हर रोज घर के बगीचों में,विद्यालय के पार्कों में और रास्ते में देखते है।
                                                                इक नन्हा पौधा भी इक नन्हे नवजात शिशु सा होता है।इक पौधे का बचपन बड़ी कष्टों से गुजरता है।आँधियों को सहता है,बरसात में भींगता है,कभी कभी तो किसी जीव जन्तु का सेवन भी हो जाता है।पर उन्ही में जो पौधे बच जाते है,वे बड़े वृक्ष का रुप धारण करते है और हमारे देश का भविष्य उज्ज्वल करते है। 
                                         यह सर्वविदित है,कि बचपन हमारी उम्र का वो परावँ होता है,जिसे कोई जैसा चाहे मोड़ दे।बिल्कुल मिट्टी के साँचे सा जिसे कुम्हार अपने मनमुताबिक आकार प्रदान करता है।बचपन में कभी हम किताबों में खोये रहते है,तो कभी बगीचे में खेलते।पर बस इक साथी हमारा पर्यावरण हर पल हमारे नजरों के सामने होता है।किताबों में विषय बनाकर उसे पढ़ते है और बागों में उसकी हरियाली के संग खेलते है। 
                                                       पर्यावरण हमारे जलवायु का भी निर्धारण करता है।इक स्वस्थ पर्यावरण ही समयानुकूल सही जलवायु का द्योतक होता है।बचपन में हमारे दादा दादी हमें न जाने कितनी दंत कथाएँ सुनाते है,जिन्हे हम बड़ी उत्सुकता से सुनते रहते है।उन कहानियों में कभी कोई पेड़ बोलता है,तो कभी उसकी शाखाएँ हाथ बढ़ाती है।किसी कहानी में चिड़ीयों का घोंसला होता है पेड़ की ओट में और कभी बरसात से भींगती मैना रानी।ये सारी बचपन की कहानियाँ हमारा ध्यान पर्यावरण की ओर ले जाती है। 
                                        इक अनकही के पुकार पर कुछ सुन हमारा बचपन इक अद्भूत आकर्षण में ओत प्रोत हो जाता है।वो आकर्षण होता है हमारा हमारे पर्यावरण के प्रति।हम एक नन्हा पौधा लाते है और अपने घर के गमले में ही उसे उगा देते है।बचपन और हमारा पर्यावरण जीवन के वैसे दो पहलू होते है,जो भूलाये नहीं जा सकते।हमारा बचपन काफी हद तक हमारे पर्यावरण के साथ मित्रवत और व्यवहारिक होता है,जो दोनों के संगत अन्योन्याश्रय सम्बंध को दर्शाता है। 
                                                       सत्यम शिवम

5 टिप्पणियाँ:

दर्शन लाल बवेजा 19 अप्रैल 2011 को 2:24 pm  

आभार इस जानकारी के लिये।

BrijmohanShrivastava 20 अप्रैल 2011 को 10:56 am  

दादा दादी की कहानियों का उददेश्य यही था कि पेड भी बोलते है उनमें भी जान है जीवन है ताकिबच्चों का उनके प्रति आकर्षण वढे और उन्हे अपना समझे। अच्छा लगा लेख ।

Neelkamal Vaishnaw 4 जुलाई 2011 को 7:02 am  

bahut achchhi baate likhi hai aapne
Badhaai swikaar kare

aapka blager mitra
Neelkamal Vaishnaw"Anish

आशा 19 दिसंबर 2011 को 7:05 pm  

एक अच्छा सार्थक लेख |
आशा

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