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बचपन और पर्यावरण. मनीषा शर्मा

>> मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

मेरा परिचय -- मनीषा शर्मा-- माँ के शिक्षक होने के कारण बचपन से ही घर में पढ़ने-लिखने के माहौल ने पढ़ने की आदत डाल दी और मीडिया से जुड़े पति के साथ ने लिखने का उत्साह जगा दिया.शायद यही कारण है कि न्यूज़ में दिलचस्पी बढ़ती गयी और पढ़ने-लिखने का यह नशा ब्लागरों की दुनिया तक खींच लाया.शुरुआत में इकलौती बेटी के लालन-पालन से जुडी व्यस्ताओं और घर के काम-काज ने उतना समय नहीं दिया पर अब तो दस साल की बिटिया भी ब्लागर बनने की ज़िद करने लगी है इसलिए मेरा कंप्यूटर पर हाथ चलाना अपरिहार्य हो जाता है.वैसे मैं मनीषा शर्मा मध्यप्रदेश में संस्कारधानी के नाम से विख्यात जबलपुर में पली-बढ़ी हूँ और फिलहाल देश की राजधानी दिल्ली की जीवन-शैली से कदम मिलाने का प्रयास कर रही हूँ. अर्थशास्त्र की छात्रा होने के बाद भी रूपए-पैसे से रत्ती भर भी मोह नहीं पर संगीत के हिसाब-किताब में सिद्धहस्त हूँ. कुछ समय तक अध्यापन में भी मन लगाया पर मज़ा नहीं आया. अब नए और रोचक स्थानों में जाकर उनके बारे में जानने और सभी को उनसे रूबरू कराने में जुटी हूँ.
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वर्तमान तो बिगाड़ लिया कम से कम तो भविष्य तो सुधर लें....

    आज के बच्चे कल का भविष्य है. आज के माहौल में बच्चों को जो भी शिक्षा मिल रही है वो उनके आने वाले समय में उपयोगी साबित होगी परन्तु केवल किताबी ज्ञान ही सम्पूर्ण नहीं है. आज के परिवेश में प्रायोगिक ज्ञान आवश्यक है. अतः सभी अभिभावकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. आज हमारे आस पास के बदलते पर्यावरण में बच्चों को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इन मुश्किलों का सामना करने के लिए बच्चों को जागरूक बनाना जरुरी है. आज का बचपन कई पर्यावरण प्रदूषणों से दो-चार हो रहा है. जिनमें ध्वनि प्रदूषण,वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण प्रमुख है. आज हम अपने बच्चों को एक अच्छा भविष्य देना चाहते है. पर क्या हम उन्हें एक सुरक्षित भविष्य दी पाएंगे? यह विचारणीय है अगर हम अपनी दिनचर्या पर नज़र डाले तो हम केवल अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में संलग्न है. हमारे आसपास क्या घट रहा है इस बारे में सोचने का समय ही हमारे पास नहीं है. मौसम में हो रहे लगातार परिवर्तनों का भी ध्यान हम नहीं रख रहे. जहाँ कभी रेगिस्तान था आज वहाँ बाढ़ आ रही है और जहाँ बर्फ जमी रहती थी वो गर्मी के प्रकोप से हैरान है, जिस जगह बारिश होती थी वो सूखे की मार झेल रहा है, वास्तव में यह ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम है. पर यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई? आज हम जंगलों को काट काटकर कांक्रीट का जंगल बसा रहे है. इनके परिणामों को लेकर कोई ध्यान नहीं दे रहा.जंगलों के अभाव में जंगली जानवरों का जीवन नरक बन गया है. जिससे वे शहरों की ओर पलायन कर रहे है. जहाँ उन्हें अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा आज वे बिना भोजन के जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैऔर हम उनका शिकार कर के उनकी खालों और शरीर के भागों को बेचकर पैसा कमाने का जरिया बना रहे हैं.आज हमारे वन्य प्राणी पोलिथिन को खाकर अपने जीवन को खत्म कर रहे है.अब तो त्यौहार भी वातावरण को बेहतर करने की बजाय बर्बाद कर रहे हैं. दीवाली पर जो पटाखे चलाये जाते है वे भी पर्यावरण को प्रभावित करते है तेज आवाज़ के धमाके से सुनने की शक्ति प्रभावित होती है पटाखों में अनेक जहरीले हानिकारक रासायनिक तत्त्व होते है जिनमें कॉपर त्वचा, लीवर, ह्रदय को हानि पहुंचाता है.लेड फेफड़े, गुर्दे के कैंसर का कारण बनता है. मैग्नीज अनिद्रा की बीमारी
देता है. अतः पटाखे भी हमारे बच्चों और पर्यावरण दोनों को प्रभावित कर रहे हैं.अब हमें यह गौर करना जरुरी है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसा भविष्य दे रहे है? क्या हम उन्हें वो उज्जवल भविष्य दे पा रहे है जिसके वो हक़दार है? शायद नहीं, तो क्या हमें इस बारे में एक सजग अभिभावक बनकर नहीं सोचना चाहिए. हमें जंगल काटने के बजाय वृक्षारोपण पर जोर देना चाहिए.पटाखों को त्याग  कर स्वास्थ्यवर्द्धक दीवाली मनाना चाहिए. घरों में बागवानी करके बच्चों को इसके लिए प्रेरित करना चाहिए. अगर  हमारे आसपास जमीन का टुकड़ा खाली पड़ा है. तो उस पर भी पेड़ लगवाने का प्रयास करना चाहिए. बच्चों को  पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना चाहिए.  स्कूल में भी शिक्षकों द्वारा बच्चों को भ्रमण  पर ले जाकर  पर्यावरण सम्बन्धी जानकर देनी चाहिए. घरों में जानवरों को पाल कर उनके प्रति बच्चों में अच्छी भावना का संचार करना चाहिए.जानवरों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहारों को रोकने के प्रयासों में अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए.
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1 टिप्पणियाँ:

दर्शन लाल बवेजा 5 अप्रैल 2011 को 8:08 am  

आभार इस जानकारी के लिये।

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